जलवायु परिवर्तन
2023 से क्या सीख मिली, इस साल भारत में मौसम में हुआ भारी उतार-चढ़ाव
डाउन टू अर्थ और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में, भारत के मौसम में भारी उतार चढ़ाव के सबसे ज्यादा मामले देखे गए, डाउन टू अर्थ के एसोसिएट एडिटर, रजित सेनगुप्ता, इससे मिली सीखों के बारे में बताते हैं
नई दिल्ली: डाउन टू अर्थ (DTE) मैगजीन और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2023 में, भारत ने 1 जनवरी से 30 सितंबर तक 273 दिनों में से 235 दिनों में मौसम में भारी उतार चढ़ाव दर्ज किया गया. इसका मतलब यह है कि इस साल के पहले नौ महीनों में से 86 प्रतिशत में, भारत में देश के एक या अधिक हिस्सों में मौसम में भारी उतार चढ़ाव देखा गया.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसी साल, भारत में कई महीनों तक रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का भी अनुभव किया गया, और देश के कई क्षेत्रों को भारी बारिश का सामना भी करना पड़ा. इस वजह से बाढ़ आई और जान-माल की हानि भी हुई.
रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और प्रसार बढ़ता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन ने पिछले साल जहां 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रभावित किया था वहीं इस साल 2023 में सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories – UT) को प्रभावित किया.
यह सब मौसम में भारी बदलाव के बढ़े हुए मामलों की तरफ इशारा करता है. साल 2023 में देश ने जो देखा वह सामान्य नहीं है.
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साल 2023 से सबक लेने के लिए और रिपोर्ट के बारे में ज्यादा जानने के लिए, बनेगा स्वस्थ इंडिया की टीम ने डाउन टू अर्थ के एसोसिएट एडिटर रजित सेनगुप्ता से बात की, जिन्होंने इस नई रिपोर्ट को लिखा भी है.
NDTV: एक्सट्रीम वेदर इवेंट क्या है और इस पर तत्काल चर्चा की आवश्यकता क्यों है?
रजित सेनगुप्ता: एक्सट्रीम वेदर इवेंट यानी मौसम में भारी उतार चढ़ाव आमतौर पर जलवायु परिवर्तन की वजह से ट्रिगर होने वाली घटनाएं होती हैं. एक्सट्रीम वेदर इवेंट मोटे तौर पर सात तरह के होते हैं – भूस्खलन (landslide), बाढ़ (floods), भारी बारिश (heavy rainfalls), बादल फटना (cloudbursts), शीतलहर (coldwaves) और लू (heatwaves). ये आमतौर पर ऐसी घटनाएं होती हैं जिनकी अवधि छोटी होती है. इसके साथ ही, हमें जलवायु से प्रेरित घटनाएं भी देखने को मिली हैं, जिसका एक उदाहरण सूखा है, जो आमतौर पर लंबी अवधि के शुष्क मौसम की वजह से ट्रिगर होता है. दूसरा उदाहरण जंगल की आग है, जो लंबे समय तक सूखे मौसम की वजह से लगती है. इस बारे में बात करते हुए कि जलवायु परिवर्तन पर चर्चा समय की मांग क्यों है – उन्होंने कहा, बहुत लंबे समय तक जलवायु परिवर्तन नजर नहीं आया. और यही एक वजह है कि दुनिया को इस बारे में बात शुरू करने में काफी समय लगा. इसके बारे में बात लगभग 1970- 80 के दशक में शुरू हुई. और, हमें 1990 और 2000 की शुरुआत में इसका असर महसूस होने लगा.
तो, एक्सट्रीम वेदर ईवेंट यानी मौसम में भारी उतार चढ़ाव वो घटनाएं हैं जो जलवायु परिवर्तन को दर्शाती हैं. ये घटनाएं जलवायु परिवर्तन का तात्कालिक प्रभाव हैं जिसे हम महसूस कर सकते हैं. और अब मौसम में भारी उतार चढ़ाव की घटनाएं लगातार देखने को मिल रही हैं. इन घटनाओं का प्रसार भी तेज होता जा रहा है. इसका एक उदाहरण राजस्थान हो सकता है, जो एक रेगिस्तानी क्षेत्र है. लेकिन, अब वह क्षेत्र बाढ़ की स्थिति का भी सामना कर रहा है. और ये घटनाएं काफी अप्रत्याशित होती जा रही हैं, यानी, जब सामान्य रूप से इन्हें घटना चाहिए, तब वह नहीं होती और जब यह नहीं होनी चाहिए, तब यह हो रही हैं. और यही वजह हैं कि हमें अब जलवायु परिवर्तन के बारे में ज्यादा से ज्यादा बात करने की जरूरत है.
NDTV: साल 2023 में जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभाव क्या रहे हैं?
रजित सेनगुप्ता: हमारी रिपोर्ट से पता चला कि भारत ने जनवरी से सितंबर की अवधि के दौरान मौसम में भारी उतार चढ़ाव की कई घटनाओं का अनुभव किया. इस समयावधि में 273 दिन होते हैं और 273 में से 235 दिनों में देश के कुछ हिस्सों में मौसम में भारी उतार चढ़ाव की घटनाएं घटी. यह जनवरी से सितंबर के बीच लगभग 86 प्रतिशत दिन है. हमने यह भी पाया कि सभी 36 भारतीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने साल 2023 में कम से कम एक दिन मौसम में भारी उतार चढ़ाव का अनुभव किया. यह दर्शाता है कि हमारे देश की हर जगह असुरक्षित है. हमने यह भी पाया कि बिजली और तूफान की घटनाएं भारत में काफी देखी जाती हैं. 273 दिनों में से 176 दिन बिजली और तूफान की घटनाएं घटीं और इसकी वजह से 711 लोगों की मौत हुईं. चिंता की बात यह है कि कुल मिलाकर मौसम में भारी उतार चढ़ाव की घटनाओं की वजह से साल 2023 में लगभग 3,000 लोगों की मौत हुई.
जनवरी और सितंबर के बीच 273 दिनों में से 132 दिनों में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की वजह से सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई. इसकी वजह से लगभग 1,903 लोग मारे गए. मौसम में भारी उतार चढ़ाव की तीसरी घटना जिस पर हमने गौर किया वह लू यानी हीटवेव थी, जो भारत में 49 दिन रही और इसकी वजह से करीब 200 लोगों की जान चली गई.
NDTV: जलवायु परिवर्तन – यह हमारे खाने के तरीके या खाना उगाने के तरीके को कैसे प्रभावित कर रहा है?
रजित सेनगुप्ता: प्री-मानसून पीरियड के दौरान ओले गिरने की वजह से खाने की कीमतें बढ़ीं, जिसकी वजह से भारत सरकार ने चावल और गेहूं के निर्यात पर कुछ तरह के प्रतिबंध लगाए. ऐसी स्थितियों को क्या ट्रिगर करता है? जब ओलावृष्टि ज्यादा होती है तो फसलों को काफी नुकसान पहुंचता है. अब देखिए भारत में 2023 में क्या हुआ, मानसून का समय, जो फसल उगाने का भी खास समय होता है, उसमें देरी हुई. देर से शुरू होने की वजह से बुआई का समय सात से आठ दिन आगे खिसक गया. फिर, तुरंत भारी बारिश हुई, और चूंकि बारिश पूरे समय एक समान नहीं थी, इसलिए बहुत से छोटे किसानों की फसलें और खेत पूरी तरह बर्बाद हो गए. और इस वजह से ये किसान पूरे साल फसल नहीं उगा पाए. इन किसानों के लिए, एक और लोन लेना और फिर से फसल उगाना लगभग असंभव था. इस सब का असर भारत के उत्पादन पर पड़ा. हमारे निष्कर्षों के मुताबिक, मौसम में भारी उतार चढ़ाव की घटनाओं के कारण इस साल लगभग 1.84 मिलियन हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ. पिछले साल, यह आंकड़ा 1.8 मिलियन था. हालांकि, अगर आप उन जगहों पर नजर डालें जहां इस साल नुकसान हुआ है तो वो पिछले साल से बहुत अलग हैं. पिछले साल, दक्षिण में फसलों को काफी नुकसान हुआ था. इस साल पंजाब और हरियाणा में ज्यादा नुकसान देखने को मिला.
NDTV: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग – क्या हमारी कोशिशें पर्याप्त हैं?
रजित सेनगुप्ता: जब हम जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपनी लड़ाई के बारे में बात करते हैं, तो दो चीजें हैं जो इससे निपटने के लिए दुनिया कर रही है – क्लाइमेट मिटिगेशन और क्लाइमेट एडेप्टेशन.
क्लाइमेट मिटिगेशन का मतलब है कि हम अपने वर्तमान उत्सर्जन को कैसे रोकते हैं, जो भविष्य की पीढ़ियों को प्रभावित करेगा और तापमान वृद्धि को 2 और 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने से कैसे रोक सकते हैं. भारत इस मामले में काफी प्रगति कर रहा है.
भारतीय नीतियां बहुत ज्यादा आक्रामक हैं. हमारे देश में रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे आने वाले सालों में भारत के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में काफी कमी आएगी.
दूसरी चीज है क्लाइमेट एडेप्टेशन यानी जलवायु अनुकूलन, जिसका मतलब है कि हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से कैसे लड़ें या हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कैसे स्वीकार करें. इस मामले में भी भारत ने अच्छी प्रगति की है. भारत ने अपने अर्ली वॉर्निंग सिस्टम में काफी सुधार किया है, जैसा कि हमने चक्रवात बिपरजॉय (Biporjoy) के दौरान भी देखा था. हमारे डेटा से पता चलता है कि 2023 में भारत में चक्रवात की वजह से केवल दो या तीन लोगों की मौत हुई थी. इसका सीधा मतलब है कि भारत इस तरह की घटनाओं से बचने में सक्षम है और तत्काल बचाव अभियान भी शुरू करता है.
लेकिन, दो ऐसी जगह भी हैं जहां देश संघर्ष कर रहा है. उनमें से एक है कि जब मौसम में भारी उतार चढ़ाव किसी क्षेत्र को प्रभावित करता है, तो उससे हुए नुकसान और क्षति के मामले में डेटा कलेक्शन सही या पर्याप्त नहीं मिल पाता है. दूसरा उन क्षेत्रों का दोबारा पूरी तरह से विकास न होना है, यदि उन्हें दोबारा ठीक से विकसित नहीं किया जाता है, तो उन क्षेत्रों में रहने वाले लोग और वह क्षेत्र अगली बार मौसम में भारी उतार चढ़ाव का सामना करने के लिए पहले से भी ज्यादा असुरक्षित होंगे.