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नेशनल डीवॉर्मिंग डे: बच्चे कैसे होते हैं कृमि से संक्रमित और संक्रमण को रोकने में स्वच्छता की भूमिका

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया भर में 1.5 अरब से अधिक लोग आंतों के कीड़ों से संक्रमित हैं, जिन्हें सॉयल-ट्रांसमिटेड हेल्मिन्थस (एसटीएच) यानी मिट्टी से फैलने वाले कृमि भी कहा जाता है. इससे भारत में 1 से 14 वर्ष की आयु के लगभग 241 मिलियन बच्चों के संक्रमित होने का खतरा होने का अनुमान व्यक्त किया गया है

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'बनेगा स्वस्थ इंडिया' टीम ने हैदराबाद के मैग्ना सेंटर्स की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष और संयुक्त राष्ट्र कोविड टास्क फोर्स की सलाहकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल सेवा रणनीतिकार डॉ. सबीना कपासी से इस विषय पर बात की है कि बच्चे कृमियों से कैसे संक्रमित होते हैं

नई दिल्ली: भारत साल में दो बार 10 फरवरी और अगस्त महीने में नेशनल डीवॉर्मिंग डे (एनडीडी) मनाता है. स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनवाड़ी केंद्रों के मंच के माध्यम से 1-19 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को कृमियों (Worms) के संक्रमण से मुक्त करने के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सन् 2015 से यह दिवस मनाया जा रहा है. इसका मकसद बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण की स्थिति और उनकी शिक्षा व जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार विश्‍व में 1.5 अरब से अधिक लोग या दुनिया की करीब 24 फीसदी आबादी आंतों के कीड़ों से संक्रमित है, जिन्हें सॉयल-ट्रांसमिटेड हेल्मिन्थस (एसटीएच) भी कहा जाता है. भारत में बड़े पैमाने पर एसटीएच का संक्रमण सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. हमारे देश में 1 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के करीब 241 मिलियन बच्चों के इससे संक्रमित होने का खतरा होने का अनुमान है.

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इस अवसर पर एनडीटीवी-डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया की टीम ने हैदराबाद के मैग्ना सेंटर्स की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष और संयुक्त राष्ट्र कोविड टास्क फोर्स की सलाहकार व सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य देखभाल सेवा रणनीतिकार डॉ. सबीना कपासी से एसटीएच के संक्रमण से संबंधित कई बिंदुओं पर बात की, जैसे कि बच्चे इन कृमियों से कैसे संक्रमित होते हैं. इनके लक्षणों की पहचान कैसे की जाए और इन कृमियों का संक्रमण कितना गंभीर हो सकता है. पेट के कीड़ों के बारे में बात करते हुए डॉ. सबीना ने कहा,

‘पेट के कीड़े हमारे शरीर के भीतर रहने वाले ‘छिपे हुए हमलावरों’ की तरह होते हैं. इनसे संक्रमित होना जितना आप सोच सकते हैं, उससे कहीं अधिक सामान्य होता है. सॉयल-ट्रांसमिटेड हेल्मिन्थस (एसटीएच) के रूप में जाने जाने वाले ये परजीवी गुपचुप तरीके से मनुष्‍य की आंतों में अपना घर बनाते हैं, हमारे शरीर के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्वों को सोख लेते हैं और असंख्य स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करते हैं.’

डॉ. शिवरंजनी ने कहा कि सॉयल-ट्रांसमिटेड हेल्मिन्थ में आंतों के कीड़ों की अलग-अलग प्रजातियां होती हैं. इनमें राउंडवॉर्म (एस्केरिस लुम्ब्रिकोइडेस), व्हिपवर्म (ट्राइचुरिस ट्राइचिउरा), पिनवर्म, हुकवर्म (नेकेटर अमेरिकन और एंकिलोस्टोमा डुओडेनेल) जैसे कृमि शामिल हैं.

मिथक बनाम तथ्य

डॉ. शिवरंजनी ने कहा कि बच्चे को कृमि संक्रमण कैसे होता है, इसके बारे में कई तरह के मिथक प्रचलित हैं. इनमें से कुछ आम मिथक इस प्रकार हैं :

मिथक 1: चीनी खाने से बच्चों को कीड़े हो जाते हैं.
मिथक 2: मसालेदार भोजन खाने से कृमि संक्रमण से बचा जा सकता है.
मिथक 3: केवल मांसाहारी बच्चों को ही कृमि संक्रमण होता है.

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी ने इन मिथकों को को पूरी तरह गलत बताते हुए बच्चों में कृमि संक्रमण के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डाला :

  1. मानव या जानवरों के मल से दूषित पानी और मिट्टी में उगी सब्जियों को बिना पकाए या अधपका खाने से.
  2. दूषित पानी या मिट्टी में नंगे पैर चलने से.
  3. जब बच्चे गुदा या उसके आसपास के क्षेत्र में खुजलाते हैं और बिना हाथ धोए ही उंगलियां अपने मुंह में डाल लेते हैं. तो ऐसे में उनके नाखूनों के नीचे फंसे कीड़ों के अंडे बच्चों की आंतों में प्रवेश कर जाते हैं.
  4. कृमियों के लार्वा और अंडों से दूषित सतहों को छूने और उसके बाद हाथ न धोने से.
  5. वॉशरूम का उपयोग करने के बाद ठीक से हाथ न धोने से.
  6. अधपका सूअर का मांस या बीफ खाने से.
  7. इन अंडों या कीड़ों के बच्चों से युक्‍त अंडर गारमेंट्स और चादरों का इस्‍तेमाल करने से.

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बच्चों में एसटीएच के लक्षणों और उसकी गंभीरता के बारे में बात करते हुए, डॉ. शिवरंजनी ने कहा कि इनमें सामान्‍यत: गुदा क्षेत्र में खुजली होना, शरीर पर चकत्ते होना, खांसी, लगातार घरघराहट महसूस होना, पैरों में सूजन रहना और बुखार जैसे लक्षण शामिल हैं. इन समस्‍याओं के चलते बच्‍चे का स्कूल में प्रदर्शन खराब होने और शारीरिक विकास बाधित होने व नींद में कमी जैसी समस्‍याएं देखने को मिलती हैं. उन्होंने कहा,

यदि पेट में कीड़ों की संख्या काफी अधिक है, तो बच्चों को आंतों में रुकावट होना, पेशाब में खून आना, आंखों की रोशनी कम होना, गुर्दे से संबंधित समस्याएं, पोषण में कमी होने जैसे गंभीर लक्षण देखने को मिलते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बच्चों को एनीमिया हो जाता है.

डॉ. सबीना ने बच्चों में होने वाली अन्य जटिलताओं पर प्रकाश डाला, जिनमें दस्त, पेचिश, भूख न लगना और भोजन का ठीक से अवशोषित न हो पाना शामिल है, जो शरीर को महत्वपूर्ण पोषक तत्वों को प्राप्‍त करने से रोकता है. बच्‍चों का कृमि से मुक्त रहना क्यों जरूरी है?

इस बारे में बताते हुए डॉ. शिवरंजनी संतोष ने कहा कि हर छह महीने में एक बार बच्चे को कृमि मुक्ति की खुराक देनी चाहिए. इसके महत्व के बारे में बात करते हुए, उन्होंने कहा कि कीड़े पोषण, विकास, शैक्षणिक प्रदर्शन, नींद और गंभीर मामलों में आंतों में रुकावट और बच्चे में दिमागी समस्याओं का कारण बन सकते हैं. इसलिए, कृमि मुक्ति से बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है, संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है और पोषण में बढ़ोतरी हो सकती है. उन्होंने आगे कहा,

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि जिन क्षेत्रों में कृमि संक्रमण की दर 20 फीसदी तक है, वहां हमें साल में कम से कम एक बार राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस मनाने की जरूरत है और भारत में यह दिन साल में दो बार फरवरी और अगस्त में मनाया जाता है.

विशेषज्ञों ने प्रभावी उपचार के रूप में दो प्रमुख दवाओं, एल्बेंडाजोल (400 मिलीग्राम) और मेबेंडाजोल (500 मिलीग्राम) के बारे में बताया. इन दवाओं की सिफारिश WHO द्वारा भी की जाती है. दवाओं के बारे में बात करते हुए डॉ. सबीना ने कहा,

ये उपचार न केवल प्रभावी हैं, बल्कि किफायती भी हैं और इन्हें गैर-चिकित्सा कर्मियों द्वारा भी दिया जा सकता है. ये दवाएं इन घातक परजीवियों के खिलाफ लड़ाई में आशा की किरण पेश करती हैं और उन्हें बड़े पैमाने पर कृमि मुक्ति कार्यक्रमों के लिए सबसे अच्छा हथियार बनती हैं.

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भारत में बच्चों को कृमि मुक्त करने के प्रयास

2015 से भारत में साल में दो बार राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस मनाया जा रहा है, विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों तक पहुंच कर उन्हें जरूरी दवाएं दी जा रही हैं.

डॉ सबीना ने कहा कि साल में दो बार एनडीडी को चिह्नित करने की सरकार की पहल से अधिक बच्चों और उनके परिवारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी. उन्होंने आगे कहा,

इस नजरिये से न केवल संक्रमण के प्रसार को रोकेगा, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य परिणामों, स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और अंततः, लोगों को मजबूत और अधिक सचेत बनाने में मदद मिलेगी. यह सामूहिक कल्‍याण के लिए हमारा एक ऐसा निवेश है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलेगा.

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