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झारखंड के एक गांव में इस 28 वर्षीय आशा वर्कर के लिए माताओं और बच्चों की सेहत है प्राथमिकता

28 वर्षीय मसूरी गगराई आदिवासी क्षेत्र झारखंड के लौजोरा कलां गांव के 1,446 लोगों के लिए आशा कार्यकर्ता के रूप में काम करती हैं

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Health Of Mothers And Children Is The Priority For This 28-year-old ASHA Worker In A Jharkhand Village

नई दिल्ली: झारखंड के एक आदिवासी इलाके लौजोरा कलां गांव में ऐसी मान्यता है कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को दिन में एक बार ही भोजन करना चाहिए. वे सुबह जल्दी खाना खा लेती हैं और घर के कामों को भी संभालते हुए दिन भर अपने बच्चे को खिलाती हैं. इसलिए 28 वर्षीय मसूरी गगराई इन सदियों पुरानी परंपराओं को तोड़ने और समुदाय में बदलाव लाने के लिए घर-घर जाकर लोगों को जागरुक करने का काम करती हैं. मसूरी गगराई गांव के 1,446 लोगों के लिए आशा (अर्थात् आशा) के रूप में काम करती हैं. आशा या मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर वो स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जो विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती हैं.

झारखंड के एक गांव में इस 28 वर्षीय आशा वर्कर के लिए माताओं और बच्चों की सेहत है प्राथमिकता

आशा कार्यकर्ता मसूरी गगराई

12वीं पास मसूरी हमेशा अपने समुदाय की सेवा करने और वंचित लोगों की मदद करने के लिए इच्छुक थीं. आशा कार्यकर्ता कैसे बनी, इस बारे में एनडीटीवी से बात करते हुए मसूरी ने कहा,

मैं एक स्व-सहायता समूह का हिस्सा थी, जो मुख्य रूप से पैसे बचाने में शामिल था. हर हफ्ते, हम, 10-15 महिलाओं का एक समूह, इकट्ठा होता था और चीजों पर चर्चा करता था. इन चर्चाओं के दौरान, हम विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दों पर प्रशिक्षण भी प्राप्त करते थे. 2019 में, ऐसे ही एक रविवार को, हम एक साथ बैठे थे जब मुझे पता चला कि रजनी, एक साथी महिला, जो गर्भवती हो गई हैं, दर्द में हैं और उनके परिवार में कोई भी उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि उनका मानना था कि होम डिलीवरी आज़माया और परखा हुआ विकल्प था. हमने उनसे मुलाकात की और मैंने रजनी को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस को बुलाया. काफी जद्दोजहद के बाद रजनी ने एक बच्चे को जन्म दिया जिसे मृत घोषित कर दिया गया था. लेकिन जब मैं बच्चे को देखने गई तो उसका शरीर नीला-हरा हो गया था लेकिन उसकी नाभि हिल रही थी और इससे मुझे उम्मीद मिली.

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डॉक्टर की सलाह पर मसूरी ने आनन-फानन में बच्चे को जिला अस्पताल पहुंचाया और उसे एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में भर्ती कराया. आज, बच्चा स्वस्थ और फुरतीला है, ये सब कुछ मसूरी की सूझ-बूझ के कारण संभव हो पाया. उन्होंने कहा,

डॉक्टर से बात करने और बच्चे को बचाने के लिए इधर-उधर भागने वाला कोई नहीं था. तभी मैंने कदम बढ़ाया. इसके लिए आज भी रजनी मुझे धन्यवाद देती हैं. मैं एक जीवन बचा पाने में सक्षम हो पाई, इसके लिए मैं खुश और गौरवान्वित महसूस करती हूं.

इस एक घटना ने मसूरी के जीवन की दिशा बदल दी और उसने अपने गांव में प्रचलित स्वास्थ्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया. सितंबर 2019 में ग्राम सभा की बैठक में मसूरी को आशा कार्यकर्ता के रूप में चुना गया था. उन्होंने एक गैर-लाभकारी स्वयंसेवी संगठन ‘एकजुट’ के स्वयंसेवकों से प्रशिक्षण प्राप्त किय. ‘एकजुट’ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को सहायता प्रदान करता है और मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य और पोषण में सुधार की दिशा में काम करता है.

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आशा मसूरी गगराई ने बच्चों का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित किया

आशा कार्यकर्ता के रूप में, मसूरी का दिन सुबह 9 बजे शुरू होता है. वह गाँव के चारों ओर जाती है, लोगों की जाँच करती हैं और महिलाओं को स्तनपान के बारे में शिक्षित करती हैं, जन्म के बाद बच्चे की देखभाल कैसे करें, और संस्थागत प्रसव और टीकाकरण क्यों महत्वपूर्ण हैं. मसूरी खुद एक सात साल के बच्चे की मां हैं. उन्होंने बताया कि,

गांव की वृद्ध महिलाएं अक्सर प्रसव के लिए अस्पताल जाने वाली महिलाओं के खिलाफ होती हैं. वे घर पर डिलीवरी में विश्वास करती हैं. हम उन्हें अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं के बारे में शिक्षित करते हैं. हम उनसे पूछते हैं, ‘आपकी बेटी की देखभाल कौन करेगा अगर उसे प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव होता है या कोई जटिलता होती है?’ जब घर की महिलाएं या सास मान जाती हैं, तो ससुर पलट कर विरोध करते हैं. फिर भी हमारा काम कोशिश करना है. ‘एकजुट’ ने मुझे पिक्टोरियल कार्ड प्रदान किए हैं जिनका उपयोग मैं महिलाओं को कब और कैसे स्तनपान करना है और स्तनपान कराने वाली माताओं के रूप में उनके पास किस तरह का पौष्टिक भोजन होना चाहिए, इत्यादि जैसी ज़रूरी जानकारी के बारे में जागरूक करने के लिए करती हूं.

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जब मार्च 2020 में नोवेल कोरोनावायरस की पहली लहर भारत में आई, जिसके परिणामस्वरूप लॉकडाउन लगाया गया, तो प्रवासी मजदूर शहरों से अपने गाँव वापस चले आए. कई लोग लौजोरा कलां गांव भी वापस आ गए और उस समय, मसूरी के पास यह सुनिश्चित करने का एक अतिरिक्त कार्य था कि शहरों से आने वाले लोग खुद को क्वारंटाइन करें और कोविड टेस्ट कराएं. मसूरी ने सबका रिकॉर्ड कायम रखा. सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने की चुनौतियों के बारे में उन्होंने कहा,

हमारे पास शहरों जैसे बड़े घर नहीं हैं जहां आप खुद को अपने कमरे में बंद कर सकते हैं और बाहरी दुनिया से खुद को पूरी तरह से अलग कर सकते हैं. गांवों में, हम संसाधनों को साझा करते हैं जैसे हम एक ही कुएं से पानी लाते हैं. महिलाएं पानी इकट्ठा करने और गपशप करने के लिए एक कुएं के चारों ओर इकट्ठा होती हैं. लोग कहते हैं कि, ‘यह किस तरह की बीमारी है कि आप एक-दूसरे से नहीं मिल सकते’ और क्या हम कभी भी सामान्य हो पाएंगे. ऐसे में मैं उन्हें बताती हूं कि अगर कोई समस्या है, तो उसका समाधान भी है – वह है कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना.

झारखंड के एक गांव में इस 28 वर्षीय आशा वर्कर के लिए माताओं और बच्चों की सेहत है प्राथमिकता

कोविड-19 महामारी के दौरान आशा कार्यकर्ता मसूरी गगराई ने लोगों को साबुन से हाथ धोने सहित बुनियादी कोविड प्रोटोकॉल के बारे में सिखाया

ग्रामीण COVID-19 के खिलाफ दवा मांगते थे, लेकिन जब टीकाकरण शुरू हुआ, तो मसूरी और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को ग्रामीणों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. लोग डरे हुए थे और उनमें एक गलत धारणा थी कि टीके से मौत हो सकती है. उन्होंने कहा,

कोविड टीकाकरण के पहले दौर में, आशा कार्यकर्ताओं सहित स्वास्थ्य कर्मियों को टीका दिया गया था और इससे मुझे लोगों के बीच विश्वास पैदा करने में मदद मिली. मैंने उन्हें दिखाया कि मैंने वैक्सीन ले ली है, मेरे पास इसके लिए सर्टिफिकेट है और मैं पूरी तरह से ठीक हूं. ये टीके हमारी सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं. मैं गांव के शिक्षकों के पास गई और उनसे कोविड-19 के खिलाफ इस लड़ाई में हमारे साथ जुड़ने के लिए कहा.

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अपनी तीन साल की सेवा में मसूरी कुछ बदलाव लाने में कामयाब रही हैं. अब महिलाएं उनके पास आती हैं और मार्गदर्शन लेती हैं. वास्तव में, उनके काम के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है. उन्होंने कहा,

शुरुआत में कोई भी हमारे काम को नहीं पहचानता था. लोग कहते थे, ‘हमें नहीं पता कि आशा दीदी क्या करती हैं. उनका काम पूरे दिन गांव में घूमना है’. हालांकि, आज, गांव में हर कोई – बच्चों से लेकर बड़ों तक – हमें, हमारे काम को जानता है और हम उनकी स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं का ख्याल रखते हैं. यह मुझे खुश करता है. मुझे ऐसा लगता है कि मैं गांव की नेता हूं.”

झारखंड के एक गांव में इस 28 वर्षीय आशा वर्कर के लिए माताओं और बच्चों की सेहत है प्राथमिकता

आशा कार्यकर्ता ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती हैं

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आशा कार्यकर्ताओं के बारे में

आशा (जिसका अर्थ हिंदी में उम्‍मीद है) मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लिए एक संक्षिप्त शब्द है. आशा, 2005 से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की सहायता करने वाली जमीनी स्तर की स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं. देश में 10 लाख से अधिक आशा वर्कर हैं. मई 2022 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने आशा कार्यकर्ताओं को समुदाय को स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए सम्मानित किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रूरल पॉवर्टी में रहने वाले लोग प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक पहुंच सकें, जैसा कि पूरे COVID-19 महामारी के दौरान दिखाई दिया. भारत की आशा डब्ल्यूएचओ महानिदेशक के ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड के छह प्राप्तकर्ताओं में से हैं. अवॉर्ड सेरेमनी 75वें वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के लाइव-स्ट्रीम्ड हाई लेवल ओपनिंग सेशन का हिस्सा था.

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