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ग्रामीणों को शिक्षित करने और अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग का उपयोग करती हैं मध्य प्रदेश की आशा वर्कर

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के गुरुगुड़ा गांव के 500 लोगों के लिए 12 साल से 45 वर्षीय रंजना द्विवेदी अकेली आशा वर्कर हैं

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ASHA Worker From Madhya Pradesh Uses Paintings To Educate Villagers And Ensure Good Health
आशा वर्कर रंजना द्विवेदी ने मध्य प्रदेश में अपने गुरुगुड़ा गांव में सभी की सुरक्षा सुनिश्चित की

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के रीवा जिले के गुरुगुड़ा गांव में केवट (नाविक) और गडरिया (चरवाहा) समुदाय के 500 लोग रहते हैं. तीनों तरफ घने जंगल और पहाड़ों से घिरे गुरुगुड़ा गांव में प्रत्येक पहाड़ी पर तीन से चार घर हैं, जिसका मतलब है कि गांव के भीतर आना-जाना एक बहुत बड़ा काम है. पहाड़ी और पथरीले इलाके के बावजूद, 45 वर्षीय रंजना द्विवेदी ASHA (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कार्यकर्ता के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान करने के लिए हर दिन गांव की यात्रा करती हैं.

रंजना द्विवेदी ने साल 2010 में उस समय एक आशा दीदी के रूप में काम करना शुरू किया, जब उन्होंने कई बच्चों को पोलियो जैसी वैक्सीन-रोकथाम योग्य बीमारियों और कुपोषण और पीलिया सहित अन्य स्वास्थ्य चुनौतियों से मरते हुए देखा. 2010 में गुरुगुडा में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति को याद करते हुए, रंजना द्विवेदी ने कहा,

पहली बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाएं भारत के इस सुदूर हिस्से तक कभी नहीं पहुंच पाएंगी. दूसरी बात यह है कि, उस समय बुखार जैसे नेचुरल साइड इफेक्ट्स के कारण लोग वैक्सीन लेने से डरते थे. मैं बच्चों को ऐसे ही मरते नहीं देख सकती थी और मैंने इस पर कार्रवाई करने का फैसला किया.

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द्विवेदी, जिनके पास बैचलर और पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा डिग्री है, उन्होंने ग्रामीणों को शिक्षित करने पर दृढ़ संकल्प लिया, जो उनके अनुसार ज्यादातर अनपढ़ हैं. एक आशा कार्यकर्ता के रूप में अपनी यूनिफॉर्म, पर्पल साड़ी पहनकर, द्विवेदी ने लोगों को जागरूक करने के प्रयास में गांव के चारों ओर घूमना शुरू कर दिया, लेकिन स्पष्ट रूप से, यह कोई आसान काम नहीं था. उन्होंने कहा,

गुरुगुड़ा गांव तक पहुंचना एक कठिन काम है. कोई भी नदी या जंगल के रास्ते यात्रा कर सकता है. जंगली जानवरों और डकैतों के कारण फॉरेस्टेड रूट छोटा लेकिन जोखिम भरा है. इसलिए, मैं नाव लेती हूं.

ग्रामीणों को शिक्षित करने और अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग का उपयोग करती हैं मध्य प्रदेश की आशा वर्कर

आशा वर्कर रंजना द्विवेदी अपनी सेवाएं देने के लिए प्रतिदिन कम से कम 6 किमी पैदल चलती हैं

द्विवेदी 20 किमी की दूरी भागों में तय करती हैं – पहले 10 किमी ऑटो से, 2 किमी पैदल, उसके बाद नाव की सवारी और फिर 4 किमी पैदल. वह अपने ट्रैवल के दौरान दो बार नाव से गिर चुकी हैं, लेकिन इससे उनका हौसला कम नहीं हुआ.

कठिन इलाका होने के कारण, एक दिन में केवल एक ही पहाड़ी की यात्रा की जा सकती है. आप पूरे गांव को कवर नहीं कर सकते, उन्होंने कहा.

ग्रामीणों को शिक्षित करने और अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग का उपयोग करती हैं मध्य प्रदेश की आशा वर्कर

आशा कार्यकर्ता रंजना द्विवेदी ने नाव से तमस नदी पार की

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एक और बाधा थी लोगों से बात करने की. आशा कार्यकर्ता को देखकर गांव की महिलाएं भाग जाती थीं. कभी-कभी बच्चे झूठ बोलते थे और कहते थे कि उनके माता-पिता लकड़ी लेने गए हैं. यह सिलसिला करीब दो साल तक चला. हालांकि, आज महिलाएं काम से एक दिन की छुट्टी लेती हैं और अपने बच्चों को नियमित टीकाकरण के लिए लाती हैं. जब भी उन्हें स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता होती है, वे अपनी आशा दीदी द्विवेदी से भी संपर्क करते हैं. यह बताते हुए कि जमीन पर परिवर्तन कैसे हुआ, द्विवेदी ने कहा,

मैनें मल्टीपल रिजेक्शन फेस किया. मुझे देखकर लोग दरवाजा बंद कर लेते थे इसके बावजूद मैंने ग्रामीण इलाकों का दौरा करना बंद नहीं किया. दूसरी बात, मैंने लोगों को किसी खास विषय पर उपदेश देने की बजाय पहले उनसे दोस्ती की. मैं उनके साथ बैठकर उनके जीवन, घर और व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में बात करती थी ताकि वे मेरे साथ सहज हो जाएं. तीसरा, मैंने हैंड पेंटिंग का सहारा लिया.

ग्रामीणों को शिक्षित करने और अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग का उपयोग करती हैं मध्य प्रदेश की आशा वर्कर

आशा वर्कर की प्रमुख भूमिकाओं में से एक चाइल्ड टीकाकरण सुनिश्चित करना है

उन्होंने अपने 23 साल के बेटे की मदद ली. उसने गांव के दृश्यों की पेंटिंग की. उदाहरण के लिए, डेंगू पर एक पोस्टर के लिए, उसने एक काल्पनिक कैरेक्टर मनमोजी काका (चाचा) बनाया, जो गांव से लकड़ी लाकर अपना जीवन यापन करता था. मनमोजी काका अपने दिन के दौरान कुछ ऐसे कार्य करते थे जिससे डेंगू के मच्छरों को बढ़ावा और पनपने का मौका मिल सके.

पोस्टर में दिखाया गया है कि मनमोजी काका हफ्तों तक एक बर्तन में पानी जमा होने देते हैं; पूरे कपड़े पहने बिना काम करना; डेंगू बुखार को नियमित बुखार मानते हुए खुद से दवाई लेने का ऑप्शन चुनना; मच्छरदानी का उपयोग नहीं करना. द्विवेदी ने बताया कि इस तरह के हाथ से पेंट किए गए पोस्टरों का ग्रामीणों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और सामुदायिक स्तर पर बदलाव में मदद मिली.

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यह सब ठीक चल रहा था जब तक कि देश में COVID-19 महामारी नहीं आई और द्विवेदी को लोगों को यह विश्वास दिलाने की एक और चुनौती का सामना करना पड़ा कि नोवेल कोरोनावायरस संक्रामक है और किसी को भी लापरवाह नहीं होना चाहिए. वहीं, कई लोग शहरों से गांव लौट रहे थे. अपने पति की मदद से, द्विवेदी काम पर गईं और यह सुनिश्चित किया कि गांव में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अलग-थलग किया जाए और सभी COVID प्रोटोकॉल का पालन करें. वह लोगों को साबुन से हाथ धोने, सामाजिक दूरी और मास्किंग सहित COVID सावधानियों के बारे में शिक्षित करने के लिए घर-घर गईं.

हमारे गांव से एक भी COVID-19 मामला सामने नहीं आया. जब मैं दूसरों की सुरक्षा के लिए वहां थी, मुझे अपनी सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी थी और उसके लिए मैं एक हैंड सैनिटाइज़र अपने साथ रखती थी. काम से लौटने के बाद, मैं नहाती और अपने बच्चों से दूरी बनाए रखती, द्विवेदी ने कहा.

एक बार फिर, उनके बेटे ने COVID प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने के नतीजों की व्याख्या करते हुए पोस्टर बनाए. पोस्टरों में से एक ने एक कल्पनाशील चरित्र रवि की कहानी बताई, जो वायरस की चपेट में आ गया क्योंकि वह बिना फेस मास्क के जनता के बीच गया था. द्विवेदी ने अपने गांव में 100 प्रति कोविड टीकाकरण भी सुनिश्चित किया. द्विवेदी ने कहा,

ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी एन के पांडे ने हमें बताया कि स्वास्थ्य विभाग से होने के कारण हम अपना काम करने से नहीं कतरा सकते. हालांकि मैं वायरस के संपर्क में आने से डरता था, लेकिन मैंने यह डर ग्रामीणों को कभी नहीं दिखाया. हर रात, घर वापस आने के बाद, मुझे खुद पर और अपने काम पर गर्व महसूस होता.

ग्रामीणों को शिक्षित करने और अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग का उपयोग करती हैं मध्य प्रदेश की आशा वर्कर

आशा वर्कर रंजना द्विवेदी के बेटे ने भारत में 100 करोड़ COVID टीकाकरण का जश्न मनाने के लिए एक पोस्टर बनाया

संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित एक अंतरराष्ट्रीय संगठन नेशनल पब्लिक रेडियो ने द्विवेदी के काम को मान्यता दी है. उन्हें दुनिया भर की तीन महिला हेल्थकेयर हीरो में से एक के रूप में फीचर्ड किया गया है, जिन्होंने COVID-19 महामारी को कंट्रोल करने के वैश्विक प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कम्युनिटी हेल्थ वर्कर द्विवेदी के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान एक प्रेरणा के रूप में आई.

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आशा कार्यकर्ताओं के बारे में

आशा (जिसका अर्थ हिंदी में उम्‍मीद है) मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लिए एक संक्षिप्त शब्द है. आशा, 2005 से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की सहायता करने वाली जमीनी स्तर की स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं. देश में 10 लाख से अधिक आशा वर्कर हैं. मई 2022 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने आशा कार्यकर्ताओं को समुदाय को स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए सम्मानित किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रूरल पॉवर्टी में रहने वाले लोग प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक पहुंच सकें, जैसा कि पूरे COVID-19 महामारी के दौरान दिखाई दिया. भारत की आशा डब्ल्यूएचओ महानिदेशक के ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड के छह प्राप्तकर्ताओं में से हैं. अवॉर्ड सेरेमनी 75वें वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के लाइव-स्ट्रीम्ड हाई लेवल ओपनिंग सेशन का हिस्सा था.

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