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Air Pollution

इस दीवाली पटाखों की जगह सीड क्रैकर्स को चुनें और वातावरण को रखें साफ

सीड क्रैकर्स में जीवित बीज लगे होते हैं, जिन्हें किसी भी खुली जगह या गमले में बोया जा सकता है

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इस दीवाली पटाखों की जगह सीड क्रैकर्स को चुनें और वातावरण को रखें साफ
Highlights
  • सीड क्रैकर्स पुनर्नवीनीकरण सामग्री और स्थानीय बीजों से बनाए जाते हैं.
  • सीड क्रैकर्स प्रदूषण मुक्त पटाखे हैं जिन्हें लगाया जा सकता है.
  • ग्रामीण महिलाओं द्वारा हस्तनिर्मित, ये पटाखे उन्हें आजीविका कमाने में मदद

हर साल जब भी दीवाली का दिन करीब आने लगता है, पटाखों को न जलाने का मुद्दा सुर्खियों में आ जाता है. यह जिम्मेदारी की भावना के साथ जश्न मनाने का सवाल है, क्योंकि हर साल कई लोग सांस लेने में परेशानी का सामना करते हैं, क्योंकि पटाखों को जलाने के कारण प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्तर को पार कर जाता है. लेकिन कल्पना कीजिए, अगर पटाखे प्रदूषण को न बढ़ाकर उसे कम करने और हरित आवरण को बढ़ाने में मदद करें तो? हम बात कर रहे हैं सीड क्रैकर्स की, जिनके इस्तेमाल से आप प्रदूषण को बढ़ाने की जगह उसे घटाने में योगदान दे सकते हैं. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित छिंदवाड़ा जिले के परदसिंगा गांव के किसानों, चित्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लेखकों का एक समूह ग्राम कला परियोजना के तहत ऐसे पर्यावरण के अनुकूल पटाखे बना रहा है.

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गनपावर बनाम सीड्स

‘बारूद बनाम बीज’ या गनपावर बनाम सीड्स जैसी पहल के तहत ग्राम कला परियोजना बीते दो सालों से पर्यावरण के अनुकूल पटाखे बना रही है. बीज पटाखा या सीड क्रैकर्स के नाम से पहचाने जाने वाले ये बीज बम जब पृथ्वी पर फेंके जाते हैं तो इनसे पौधे उगाने में मदद मिलती है. ग्राम कला परियोजना के एक कार्यकर्ता वेदांत भट्टड के अनुसार, ये पटाखे हाथ से बनाए जाते हैं और इनमें स्थानीय किसानों और वनवासियों द्वारा लिए गए स्थानीय बीज होते हैं.

वेदांत ने आगे कहा, हम इन पटाखों को दोबारा इस्तेमाल होने वाले कागजों और पर्यावरण के अनुकूल और नॉन-टॉक्सिक कलर्स से बनाते हैं. ये न शौर करते हैं और न ही पक्षियों और जानवरों को नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें प्रकृति के अनुकूल ही बनाया जाता है. अगर आप त्‍योहार मनाने के लिए उत्सुक है और पटाखों का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इन्हें चुनें. आपको बस इन पटाखों को 1-2 घंटे के लिए भिगोना है, फिर बीजों को गीली मिट्टी में बोना है और इन पटाखों से सुंदर पौधों को देखना है.

ग्राम आर्ट प्रोजेक्ट के तहत सीड क्रैकर्स पर काम करने वाले भटाड़ ने भी सीड क्रैकर्स को लेकर जानकारी शेयर की. उन्होंने बताया दीपावली पर उनके द्वारा बेचे जाने वाले बॉक्स में पौधों के बीजों का एक विविध संग्रह होता है- ‘माइक्रोग्रीन लाडी’ में लाल ऐमारैंथस, हरी ऐमारैंथस, सेना तोरा, मूली, सरसों, पर्सलेन और पालक के बीज होते हैं. एक और सीड क्रैकर, जिसे उन्होंने प्याज चक्कर नाम दिया है, उसमें प्याज के बीज होते हैं, ‘टिकली’ में धनिया के बीज होते हैं. वहीं ‘रॉकेट’ में ककड़ी के बीज होते हैं जबकि ‘अनार’ और ‘लक्ष्मी बम’ में गोल्डन शावर ट्री, अगस्ती के बीज होते हैं.

उन्हें इनके बिकने की कम ही उम्मीद थी, लेकिन उपभोक्ताओं की भारी प्रतिक्रिया ने उन्हें हैरान कर दिया है.
हमने 2020 की दिवाली के दौरान दो हफ्ते के अंदर करीब 10000 सीड क्रैकर्स बनाएं और खास बात है कि वे सभी बिक भी गए. इस साल हमने करीब 50000 सीड क्रैकर्स बनाए हैं और हम इस स्टॉक को भी पूरा बेचने के करीब हैं. आपको सिंगल पटाखे 20-45 रुपये की कीमत में मिल सकते हैं. हमारी वेबसाइट पर बेचे जा रहे मिक्‍सड बॉक्स या गिफ्ट बॉक्स 299-699 रुपये में बेचे जा रहे हैं. ये पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में थोड़े महंगे होते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम इन पटाखों को बिल्कुल टॉक्सिन फ्री मुक्त और एक्सप्रलो एटेशन फ्री बनाते हैं. भट्टाड ने कहा, इस तरह के कच्चे माल की खरीद महंगी है.

भट्टाड के अनुसार, पहल के पीछे का विचार पटाखों के लिए एक विकल्प खोजना था, क्योंकि ये त्योहारों, नए साल, शादियों और अन्य समारोहों के दौरान बच्चों और युवाओं के लिए मुख्य आकर्षणों में से एक हैं.

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उन्होंने कहा, सभी बीजों को किचन गार्डन या गमले या किसी खुली जगह में लगाया जा सकता है. यह बच्चों के लिए भी एक सीखने का अनुभव हो सकता है जो जीवन में चीजों के लिए स्थायी विकल्प चुनने की आदत पैदा करेगा.

पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आजीविका कमाने में भी मदद कर रही है. भट्टड के अनुसार, पारंपरिक पटाखे बाल श्रम, खराब मजदूरी, खतरनाक काम करने की स्थिति, पर्यावरण को नुकसान सहित सभी प्रकार के शोषण के साथ बनाए जाते हैं, लेकिन दूसरी ओर बीज पटाखे गरीबों को कौशल और आजीविका कमाने में मदद कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, दरअसल, सिर्फ त्योहारों पर ही हम स्वदेशी बीजों पर कुछ नहीं करते हैं बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है. हम खेती करते हैं, अपने किचन गार्डन पर काम करते हैं और सीड पेपर्स, सीड बॉल्स बनाते हैं. साल भर बीज और खेती से जुड़ी नीतियों और कानूनों के बारे में जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं और अपनी उपज का दैनिक उपभोग भी करते हैं. लेकिन त्योहारों के दौरान हमारी (समग्र रूप से समाज) दैनिक खपत काफी बढ़ जाती है. एक ऐसी दुनिया का हिस्सा होने के नाते जहां हम उपभोग की जाने वाली अधिकांश चीजें सम्मानजनक श्रम और सहजीवी सह-अस्तित्व के उत्पाद होने के बजाय शोषण का उत्पाद हैं, यह एक जिम्मेदारी बन जाती है कि हम जब भी संभव हो इसके बारे में बात करें. हमारे साथ करीब 100 महिलाएं काम कर रही हैं और वह अपने घरों से काम करती हैं. हम उन्हें कौशल प्रशिक्षण और सामग्री प्रदान करते हैं. ये महिलाएं पटाखों के अलावा बीज राखी, कार्ड, कागज आदि भी बनाती हैं. हम बनाई गई वस्तुओं को बेचने में मदद करते हैं और उन्हें 25 रुपये प्रति घंटा का भुगतान करते हैं.

एनडीटीवी से बात करते हुए, सीड क्रैकर्स बनाने वाली 45 वर्षीय महिला गीता केसकर ने कहा कि इस पहल से उन्हें अपने और अपने तीन बच्चों के लिए बेहतर जीवन पाने में मदद मिली है.

उसने कहा, मेरे पति एक कारखाने में काम करते हैं लेकिन हमारे लिए आय के केवल एक स्रोत के साथ अपने खर्च का प्रबंधन करना वास्तव में मुश्किल था. हम दोनों चाहते थे कि हमारे तीन बच्चे- एक बेटा और दो बेटियां अच्छी शिक्षा प्राप्त करें. इसलिए मैंने भी काम करने का फैसला किया, लेकिन बच्चों के छोटे होने के कारण मेरे लिए घर से बाहर काम करना मुश्किल था. मुझे ग्राम कला परियोजना के बारे में पता चला और मैंने अपने घर से ही उनके साथ काम करना शुरू कर दिया. अब मैं काम के आधार पर प्रति माह लगभग 5,000-8,000 रुपये कमा पा रहा हूं. यह तब और भी मददगार साबित हुआ जब कोविड लॉकडाउन के दौरान मेरे पति की आय घटकर आधी रह गई. मुझे लगता है कि प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे फोड़ने के बजाय पर्यावरण को वापस देने का यह एक अच्छा तरीका है.

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