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संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की एक्‍सपर्ट से जानें, जलवायु परिवर्तन वैश्विक भूख को कैसे प्रभावित कर रहा है?

जलवायु परिवर्तन वैश्विक भूख को कैसे प्रभावित कर रहा है? बता रही हैं एक्‍सपर्ट प्रज्ञा पैठणकर.

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संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की एक्‍सपर्ट से जानें, जलवायु परिवर्तन वैश्विक भूख को कैसे प्रभावित कर रहा है?

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन हम में से हर किसी को प्रभावित करता है, जैसा कि हम COP26, 2021 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिए तैयार हैं, जो यूनाइटेड किंगडम में 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक आयोजित किया जा रहा है, हमने संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (UNWFP) से प्रज्ञा पैठणकर के साथ बात की. एनडीटीवी-डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया कैपेंन के दौरान फेसबुक लाइव में, पैठंकर ने जलवायु संकट से खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा और जलवायु संकट में व्यक्ति कैसे योगदान कर सकते हैं, इसके बारे में बताया.

जानिए उन्‍होंने क्या कहा:

सवाल: जलवायु में यह परिवर्तन समग्र रूप से सतत विकास लक्ष्यों को कैसे प्रभावित करता है?

प्रज्ञा पैठणकर: सतत विकास लक्ष्यों के बारे में बात करते हुए, मैं SDG2 पर जोर देना चाहूंगी, जिसका उद्देश्य भूख मुक्त दुनिया को पाना है और इसमें भोजन और पोषण के सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया है. यह विशिष्ट लक्ष्य चार आयामों पर निर्भर करता है –

a. भोजन की उपलब्धता,

b. आर्थिक और भौतिक पहुंच,

c. भोजन का इस्‍तेमाल

d. निश्चित समय के दौरान उपरोक्त सभी तीन आयामों की स्थिरता

इसके अलावा, हाल के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि विश्व भूख बढ़ रही है. जलवायु संकट और महामारी प्रमुख चालक हैं. SDG2 पर प्रगति बेहद धीमी रही है और विभिन्न एसडीजी के बीच परस्पर संबंध हैं. SDG2 शिक्षा, स्वास्थ्य, भलाई, लैंगिक मुद्दों, भोजन की बर्बादी और नुकसान और सबसे महत्वपूर्ण जलवायु परिवर्तन जैसे कई अन्य कारकों से जुड़ा हुआ है. जलवायु परिवर्तन SDG2 को काफी हद तक प्रभावित करता है. जब हम जलवायु परिवर्तन के बारे में बात करते हैं, तो यह पहले से ही खाद्य सुरक्षा के इन सभी चार आयामों को प्रभावित कर रहा है और इसका असर वास्तव में कुपोषण के सभी निर्धारकों तक फैले हुए हैं.

अगर हम जलवायु परिवर्तन और एसडीजी के बीच की कड़ी के बारे में बात करते हैं, तो मैं कहूंगी कि अधिकांश संकेतक जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं, लेकिन एसडीजी 2 विशेष रूप से जलवायु की नाजुकता और जलवायु-प्रेरित घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है.

सवाल: क्‍लाइमेट चेंज से फूड प्रोडक्‍शन कैसे प्रभावित होता है?

प्रज्ञा पैठणकर: जलवायु परिवर्तन के कारण हमारे खाद्य उत्पादन पर भारी प्रभाव पड़ा है. हमारे मुख्य चालक के रूप में – कृषि क्षेत्र को सीधे जलवायु संकट का बोझ झेलना पड़ता है. जब भी हम खाद्य उत्पादन के बारे में बात करते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कृषि क्षेत्र होता है और जब हम उस क्षेत्र के बारे में बात करते हैं तो यह तापमान में वृद्धि, ग्लोबल वार्मिंग, बारिश, हीटवेव जैसे कई अन्य कारकों से निर्धारित होता है. ग्लोबल वार्मिंग वर्षा को प्रभावित करती है, वर्षा पैटर्न और इन सभी में परिवर्तन का उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है.

हम पैटर्न में बदलाव देख रहे हैं, उदाहरण के लिए, अब उन क्षेत्रों में बाढ़ आ गई है जहां ऐसा कभी नहीं होता था. कुल मिलाकर बाढ़ अधिक तीव्र और लगातार होती जा रही है. हीटवेव बार-बार हो रही हैं और इन सभी का कृषि उत्पादन पर अपना प्रभाव पड़ रहा है.

सवाल: खाद्य प्रणालियां जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होती हैं और वे जलवायु संकट में भी योगदान करती हैं – हम इस दोहरी चुनौती का हल कैसे करते हैं?

प्रज्ञा पैठणकर: हमारी खाद्य प्रणाली वास्तव में ग्रीनहाउस गैसों को जन्म देती है. यह लगभग 20-30% उत्सर्जन में योगदान देता है, इसमें से 50% वास्तव में कृषि द्वारा योगदान दिया जाता है. साथ ही, कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से सबसे पहले प्रभावित होता है और इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम सामने आते हैं. यह सबसे गरीब परिवारों में विशेष रूप से दिखाई देता है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कृषि पर निर्भर करता है.

दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र ही जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है. मुझे लगता है, अब इस तरह की रणनीतियों को देखने की जरूरत है:

– प्रोडयूसर को समाधान के केंद्र में होना चाहिए

– सॉल्‍यूशन उत्पादक केंद्रित होने चाहिए और उनकी पहुंच, प्रशिक्षण और वित्तपोषण को आसानी से सम्मानित किया जाना चाहिए

– हमें फसल संशोधन या आजीविका के वैकल्पिक स्रोत को भी देखना शुरू करना चाहिए, जो बदले में कृषि पर दबाव को कम करेगा

सवाल: जलवायु परिवर्तन और भूख के दौरान खाने की बर्बादी करना कितनी बड़ी चुनौती है? हम व्यक्तिगत स्तर पर क्या कर सकते हैं?

प्रज्ञा पैठणकरर: भोजन की बर्बादी और भूख एक ऐसी स्थिति है जो एक साथ रहती है. समस्या बहुत बड़ी है और इसका उत्तर यह है कि हम वास्तव में दुनिया भर में लगभग 1.6 बिलियन लोगों को, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है, नुकसान और अपव्यय के कारण 1.3 बिलियन टन भोजन कैसे उपलब्ध करा सकते हैं.

तो, हम वास्तव में किसी को पीछे नहीं छोड़ कर समान वितरण कैसे पा कर सकते हैं, यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर हम सभी को देना होगा. व्यक्तिगत स्तर पर, बहुत सी चीजें की जा सकती हैं, जीवन में अनुशासन लाने से लेकर भोजन बनाने या खाना पकाने तक. हमें भोजन को बर्बाद करना बंद करना होगा और किसी भी प्रकार की बर्बादी के प्रति संवेदनशील बनने की आदत डालनी होगी. हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम क्या खा रहे हैं और इसे कैसे स्टोर कर रहे हैं. हमें खाद्य परिवहन लागत, भंडारण लागत को कम करने वाले विकल्प बनाने की आवश्यकता है, जिसका सीधा-सा मतलब है, हमें स्थानीय रूप से उपलब्ध भोजन की सोर्सिंग शुरू करने की आवश्यकता है. जब भोजन की बर्बादी की बात हो तो खुद को और अपने परिवार को अनुशासित करके एक परिवर्तन एजेंट बनें.

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सवाल: क्‍लाइमेट एक्‍शन किस प्रकार अधिक पार्टिसपटॉरी हो सकती है?

प्रज्ञा पैठणकर: जलवायु संकट से निपटने के लिए सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय कार्रवाई अधिक अनिवार्य है. सामुदायिक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण समुदायों के सामने आने वाले परिवर्तनों और चुनौतियों को जानना महत्वपूर्ण है. स्थानीय चीजों में निवेश करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. हमें इन स्थानीय चीजों को निर्णय लेने और योजना बनाने वाली समितियों में लाना चाहिए. हमें स्थानीय रूप से अपने समुदाय पर आधारित समाधानों को बढ़ावा देना चाहिए और अब सभी हितधारकों को एक साथ लाना और सकारात्मक बदलाव लाना महत्वपूर्ण है. जलवायु परिवर्तन को जन आंदोलन में बदलना चाहिए।.

सवाल: जब खाद्य और खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य की बात आती है तो ग्लोबल वार्मिंग फसलों को कैसे प्रभावित करती है?

प्रज्ञा पैठणकर: हमें यह जानने की जरूरत है कि हम कुपोषण से निपट रहे हैं, खासकर जब हम एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बारे में बात करते हैं तब. यदि जलवायु परिवर्तन वास्तव में हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन से पोषण मूल्य की कमी कर रहा है तो हम SDG2 कैसे पा सकते हैं.

एक रिपोर्ट है जिसमें जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है, इसमें कहा गया है कि कार्बन डाइऑक्साइड के लेवल 546 के वायुमंडलीय सांद्रता में गेहूं उगाया जाता है, इसमें लगभग 6-13% कम प्रोटीन और लगभग 3-4% कम जस्ता और लोहा होता है.

हम जानते हैं कि दुनिया के भारत और एशिया क्षेत्र एनीमिया से कैसे पीड़ित हैं. इसलिए, हम अपने आहार में पोषण को कैसे बनाए रखेंगे, यह एक ऐसी चीज है जिसके बारे में हमें वास्तव में जलवायु संकट के साथ-साथ सोचने की जरूरत है.

हमें बाजरे जैसी जलवायु के अनुरूप फसलों का रूख करना शुरू करना होगा और साथ ही उन तरीकों के बारे में सोचना होगा, जिससे हम यह सुनिश्चित कर सकें कि हम अपने फलों और सब्जियों के पोषण मूल्यों को बचा सकते हैं, जिन्हें स्वस्थ आहार का प्रमुख घटक माना जाता है.

सवाल: COP26 क्यों जरूरी है और यह यंग जेनरेशन को कैसे प्रभावित करता है?

प्रज्ञा पैठणकर: COP26 हमारी वर्तमान और भविष्य की यंग जेनेरशन को सुरक्षित करने के लिए अहम है, उनके और हमारे ग्रह के लिए एक सुरक्षित जीवन का वादा करने के लिए इसका अहम रोल है, क्योंकि कोई ग्रह बी नहीं है.

यह मंच वास्तव में जलवायु संकट के संदर्भ में प्राथमिकता के मुद्दों पर दुनिया भर के देशों द्वारा तत्काल कार्रवाई को उजागर करने और प्रतिबद्ध करने का एक शानदार अवसर देता है. अगर हम विशिष्ट लक्ष्यों के बारे में बात करते हैं, तो COP26 ने अपने लिए कुछ ठोस लक्ष्य निर्धारित किए हैं, कुछ मुद्दे जैसे कार्बन उत्सर्जन पर 2030 लक्ष्य, 2050 के लिए शुद्ध-शून्य लक्ष्य. यह मंच पेरिस रूल बुक को अंतिम रूप देने और जानने का अवसर भी देता है. देशों और सदस्यों ने इसे हासिल करने की योजना बनाई है.

आज की यंग जेनरेशन इतिहास में सबसे बड़ी है. इसके अलावा, अधिक से अधिक युवा आज जलवायु संकट से जुड़े हुए हैं, क्योंकि वे ही भारी परिणामों का सामना करेंगे. उन्हें बहुत बड़ी भूमिका निभानी है, वे वही होंगे जो कल के परिवर्तन निर्माता बनेंगे.

सवाल: क्या ग्लोबल वार्मिंग महिलाओं और पुरुषों को अलग तरह से प्रभावित करती है? ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि से कौन अधिक भूखा रहता है?

प्रज्ञा पैठणकर: जैविक रूप से कहें, तो हमें समान रूप से भूखा रहना चाहिए. हालांकि, यह कहते हुए कि हम यह भी जानते हैं कि महिलाएं अपने परिवार को खिलाने में एक अहम रोल निभाती हैं क्योंकि वे न केवल उनके लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए खाने और भोजन का उत्पादन और प्रसंस्करण करती हैं.

जलवायु परिवर्तन का गरीब और कमजोर समुदायों की आजीविका पर तत्काल और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका हिस्सा महिलाएं हैं.

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सवाल: खेत से प्‍लेट तक का फूड जलवायु संकट में कैसे योगदान देता है?

प्रज्ञा पैठणकर: बारिश, गर्मी और तापमान में वृद्धि से प्रोडक्‍शन प्रभावित होता है. कीटनाशकों की वृद्धि हो सकती है या बीमारियों की वृद्धि हो सकती है – सभी का उत्पादन पर एक बड़ा प्रभाव पड़ेगा.

अगर हम दूसरी खाद्य प्रणाली के बारे में बात करते हैं जो भंडारण है तो वह है फिर से प्रभावित होगी. क्योंकि आर्द्रता के स्तर में बदलाव हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप कोल्ड स्टोरेज की जरूरतें बढ़ सकती हैं और इससे खाने की बर्बादी हो सकती है.

वहीं, अगर तर्थ फेस की बात करें जो कि रिटेल और मार्केटिंग है, तो इसका असर खाद्य कीमतों पर पड़ता है. यदि खाने की कीमतें बढ़ती हैं तो स्वाभाविक रूप से गरीबों के बीच भोजन की उपलब्धता और पहुंच कम हो जाएगी और इसका फिर से खाद्य और पोषण सुरक्षा पर भारी प्रभाव पड़ेगा.

उदाहरण के लिए, जब कोई किसान बाजरे की तरह भोजन का उत्पादन करता है, यदि स्थानीय रूप से इसका सेवन किया जाता है तो यह ठीक है, लेकिन अगर यह एक जगह से दूसरी जगह जाता है, तो यह ग्रीनहाउस गैसों में योगदान देता है, क्योंकि इसमें भंडारण की आवश्यकता होगी, इसमें भंडारण शामिल होगा. यह जानना जरूरी है कि हम इस समग्र फूड चेन में समग्र प्रदूषण को कैसे कम कर सकते हैं, एक बार जब हमें पता चल जाएगा कि हम जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सक्षम होंगे.

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