कोई पीछे नहीं रहेगा

प्राइड मन्थ स्पेशल: समलैंगिक जोड़े की प्रेम कहानी में LGBTQIA+ समुदाय की अग्नि परीक्षा की दास्तां

एनडीटीवी-डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया ने दिल्ली बेस्ड समलैंगिक जोड़े योगी और कबीर से LGBTQIA+ समुदाय से जुड़े मूलभूत अधिकारों पर बात की

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योगी और कबीर समलैंगिक विवाह पर कहते हैं कि इससे होम लोन लेने, लाइफ व मेडिकल इंश्योरेंस में पार्टनर को नॉमिनेट करने जैसे कई अन्य मूल अधिकारों के रास्ते खुल सकेंगे

नई दिल्लीः “प्यार वही जो सबको समझ आए, ऐसा जरूरी तो नहीं, सच वही जिसे भीड़ चिल्लाए, ऐसा जरूरी तो नहीं; दो लड़के अगर एक दूसरे से प्यार करें तो इसमें इतना अजीब क्या है, दिल को अपना हमशक्ल सिर्फ अपोजिट सेक्स में दिखे, ऐसा जरूरी तो नहीं?” 34 वर्षीय योगी की तरफ से बोले गए शब्द, उनके पार्टनर कबीर के साथ उनकी यात्रा को दर्शाते हैं. दोनों की मुलाकात 2015 में हुई थी और तमाम मुश्किलों के बावजूद दोनों का प्यार फलता फूलता रहा. एक दूसरे से मिलने से पहले योगी और कबीर को अपने आप से ही संघर्ष करना पड़ा, पहले तो अपनी पहचान को स्वीकार करने में फिर उसके साथ आगे बढ़ने में और फिर दुनिया के सामने इसका खुलासा करने में.

पहचान के संकट की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 34 वर्षीय कबीर ने अपने जीवन के शुरुआती हिस्से को विषमलैंगिक के रूप में जीया.

मेरे लिए बड़े होने में बहुत कठिन समय था क्योंकि मैं अपने आप पर इतना सख्त था कि मैंने कभी भी अपने आप को यह सोचने ही नहीं दिया कि मैं क्या महसूस कर रहा था. मैंने खुद को इस तरह से तैयार कर लिया, इतना कि मैं खुद को इसके बारे में सोचने की इजाजत भी नहीं देता था

दिल्ली में एक पंजाबी परिवार में कबीर का जन्म हुआ. तीन भाई बहनों में सबसे छोटे कबीर ने 14 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था और तबसे ही घर में अपने आप उनकी भूमिका ‘घर के मर्द’ की तरह की हो गई थी.

शायद यही वह वजह थी कि मैं अपने आप के साथ बेहद सख्त था और इसलिए कभी खुद को इस तरह सोचने नहीं देता था कि मुझे कैसा महसूस हुआ करता था

लेकिन 27 की उम्र में, उन्होंने अपने परिवार इस बारे में बताने का फैसला किया.

स्वाभाविक रूप से पहला भाव तो यही था कि मैं ग्लानि से भरा हुआ था. परिवार के इकलौते बेटे होने के कारण मुझसे अपेक्षा यही थी कि अपना वंश आगे बढ़ाऊं और दूसरा अपने पति को खोने के बाद मेरी मां हम तीन बच्चों को अपने दम पर पालते हुए खुद को काफी सख्त कर चुकी थीं. और अब मेरे समलैंगिक होने के बारे में पता चलता, तो उन्हें और धक्का ही लगना था.

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इन हालात में, संतुलन बनाने के लिए कबीर के सामने दो रास्ते थे कि वह या तो अपने सच के साथ सामने आए या फिर दूसरों की खुशी के लिए एक झूठ को ही जीता रहे. कबीर ने पहला रास्ता चुना और उसे खुशी थी कि उसने इस तरह का चुनाव किया. कबीर का कहना है कि दूसरों को लग सकता है कि वह स्वार्थी हो गया, लेकिन उसने दूर की सोची थी. अगर वह किस लड़की से शादी कर लेता तो दोनों की ही जिंदगी तबाह हो जाती.

दूसरी तरफ, योगी एक पारंपरिक मारवाड़ी परिवार से ताल्लुक रखते हैं. शुरूआत से ही उन्हें परिवार के व्यवसाय को अपनाने के लिए तैयार किया गया था और साथ ही यह भी तय था कि माता पिता की चुनी हुई लड़की के साथ ही उनकी शादी होगी. उन्हें हमेशा बताया जाता था, ‘एक मर्द को क्या करना होता है’.

कॉलेज में सेकंड इयर के दौरान जब मैं एक लड़के के साथ संबंध में था, तब मुझे अपने अपनी लैंगिकता के बारे में अहसास हुआ

तब यह वह समय था, जब उन्होंने अपने परिवार के सामने सच बोलने का फैसला किया. पहले पहल तो परिवार सकते में था लेकिन धीरे-धीरे बाकी तमाम बातों को दरकिनार करते हुए अपने बेटे की खुशी के लिए उन्होंने इस सच को स्वीकार किया. योगी बाद में मुंबई चले गए, जहां कबीर के साथ उनकी मुलाकात कामकाज की जगह पर हुई और दोनों ने एक दूसरे को डेट करना शुरू किया. योगी पत्रकारिता में अपना पोस्ट ग्रैजुएशन कर चुके थे जबकि कबीर ने इंदौर से अपना एमबीए पूरा कर लिया था. दोनों एक एफएम रेडियो स्टेशन की अलग-अलग शाखाओं में काम कर रहे थे और जल्द ही एक सहकर्मी के माध्यम से दोनों की मुलाकात हुई. योगी और कबीर दोनों का ही करियर रेडियो जॉकी के तौर पर सफल रहा और दोनों मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशंस के लिए काम करने की दिशा में आगे बढ़े.

कुछ महीने ही डेटिंग करने के बाद दोनों को पता चल गया था कि उन्हें साथ ही जीना है. आठ साल हो चुके हैं और अब दोनों दिल्ली में साथ में रह रहे हैं.

जब तक हम दोनों एक दूसरे से मिले नहीं थे, तब तक बस जिंदा ही थे और अब एक कपल की तरह साथ में जीते हुए हम फल-फूल रहे हैं.

योगी अपने परिवार और दुनिया को कबीर के बारे में बताना चाहते थे. समय के साथ उन्होंने अपने साथी को अपनी मां से मिलवाया. योगी का परिवार हालांकि पुराने ख्यालों का ही था, लेकिन कुछ समय बाद कबीर को उन्होंने अपना लिया.

उन्होंने मुझे इस तरह स्वीकार किया और ऐसा अपनापन दिया कि मैं सोच भी नहीं सकता था. कबीर ने कहा कि जब भी योगी अपने घर जाते थे तो उनसे यह जरूर पूछा जाता था कि मैं कहां हूं

दोनों कहते हैं कि उनका रिश्ता किसी भी और रिश्ते की तरह ही बिल्कुल सामान्य है. लेकिन जिंदगी में कई बार दोनों के साथ एक कपल के तौर पर बर्ताव नहीं किया जाता.

कबीर का कहना है कि गे के तौर पर, आज भी इन दोनों को सामाजिक दबावों के कारण झुकना पड़ता है और अपनी पहचान और रिश्ते को गुप्त रखने का रास्ता चुनना पड़ता है.

मैं अब भी कई तरह के सामाजिक कार्यक्रमों में यह जाहिर नहीं कर सकता कि मैं गे हूं. मुझे डर रहता है कि इसका अंजाम क्या होगा. मुझे याद है, फरवरी में योगी के साथ जब एक रेस्तरां में गया था, वहां वैलेंटाइन डे का जश्न चल रहा था. वहां बोर्ड लगे थे – ‘केवल जोड़ों के लिए’, और पिछले अनुभवों के चलते हमें इस बात का डर था कि अगर हम उन्हें बताएं कि हम एक कपल तो क्या हमें वहां इजाजत अंदर आने की इजाजत मिल सकेगी. किसी को पता न चल जाए कि हम गे हैं, लगातार इस डर के साथ रहने में दम घुटता है. प्रोफेशनली, सब कुछ बढ़िया चलने के बावजूद, मैं इस तरह के माहौल में रहता हूं, जहां लगातार यही सोचते रहना पड़ता है – हम अपने बारे में खुलकर बोलें या बस छुपाते रहें

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दोनों जिस तरह का भेदभाव झेलते रहे हैं, वह हालांकि बहुत तीखा नहीं रहा लेकिन फिर भी इतना तो रहा ही है कि सार्वजनिक स्थानों पर अपने बर्ताव और उनके प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं को लेकर वे सतर्क रहें. एक बार, एक होटल में कमरा बुक करने के दौरान, फ्रंट डेस्क स्टाफ ने माफी मांगी थी कि उन्हें दो बेड वाले कमरे के बजाय एक क्वीन साइज बेड वाला रूम दिया गया. जब उसे पता चला कि हमारी पसंद भी यही थी तो उस महिला ने उनकी इस बात पर एक अजीब तरह की प्रतिक्रिया दी थी.

कबीर एक और घटना के बारे में बताते हैं,

मुझे याद है एक बार जब हम अलग-अलग शहरों में थे और योगी काफी उदास महसूस कर रहा था. तब मैं उसे कोई सरप्राइज देकर उसे खुश करना चाहता था. मैंने तब एक फ्लावर डिलीवरी वाले व्यक्ति से तोहफे के साथ एक रोमांटिक संदेश लिखने के लिए बोला, जो ‘डियर योगी’ से शुरू होता था और ‘विद लव, कबीर’ जैसे शब्दों के साथ खत्म. मैं सुन सकता था कि वह इस तरह का संदेश लिखने में कितना असहज महसूस कर रहा था. लेकिन मुझे खुशी है कि उसने इस संदेश के साथ फूल भिजवा दिए

इस कपल ने हालांकि अपने व्यावसायिक क्षेत्र में किसी तरह का भेदभाव नहीं झेला, क्योंकि दोनों जिस संस्थान में काम करते हैं, वह समावेशी सोच में यकीन रखता है. इस संस्थान से जो मेडिकल इंश्योरेंस मिलता है, दोनों ने एक कपल के तौर पर एक दूसरे को नॉमिनेट किया हुआ है, हालांकि भारत में ऐसे अन्य कई या समलैंगिक जोड़ों को इस तरह की सुविधा नहीं मिल पाती है.

‘शुद्ध देसी गे’

ये दोनों भारत के लीडिंग LGBTQIA + पॉडकास्ट ‘शुद्ध देसी गे’ के होस्ट हैं. यह स्पॉटीफाई ओरिजनल पॉडकास्ट है. देश में पहली बार समलैंगिक पार्टनरों के लिए जारी की गई इंश्योरेंस पॉलिसी के ब्रांड एंबेसडर के तौर पर ये दोनों जनवरी 2023 में, कई आउटडोर होर्डिंगों पर भी नजर आए थे. इनके पॉडकास्ट ने हबहॉपर पॉडकास्ट अवार्ड्स 2022 में बेस्ट सेल्फ-लव एंड मोटिवेशन पॉडकास्ट का खिताब जीता था. उन्हें हाल ही में कॉस्मोपॉलिटन ब्लॉगर्स अवार्ड्स 2023 में LGBTQ+ वॉयस ऑफ द ईयर केटेगरी में नॉमिनेट किया गया था.

लाभ के बिना जी रहे LGBTQIA+

योगी और कबीर दोनों ही हालांकि अपने-अपने मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन में काम कर रहे हैं, लेकिन दूसरे विषमलैंगिक युगलों से उलट, उन्हें मूल अधिकार प्राप्त नहीं हैं. बैंक में संयुक्त खाते की बात हो, टैक्स में छूट के लाभ हों, जीवनसाथी की मौत के केस में उत्तराधिकार या पेंशन आदि जैसे तमाम मामलों में LGBTQIA+ समुदाय के लोगों को ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

भारत में शादी के बाद एक कपल को टैक्स संबंधी कई लाभ मिलते हैं, जिसका फायदा कोई भी ले सकता है: मेडिकल इंश्योरेंस या होम लोन पर टैक्स छूट के लिए सेक्शन 80 C के अंतर्गत दावा किया जा सकता है. इनकम टैक्स एक्ट के अंतर्गत 80C, 80CC, 80 CCE जैसे कई सेक्शन लाइफ इंश्योरेंस को लेकर टैक्स में छूट जैसे लाभ देती हैं. इसके अलावा, युगलों को अपने बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क में भी छूट का लाभ मिल सकता है. कबीर ने कहा,

कोई भी विषमलैंगिक अपने पार्टनर या बच्चों की जगह उनका इंश्योरेंस प्रीमियम, पीपीएफ या एनएसएस आदि का भुगतान कर सकता है और छूट पा सकता है. लेकिन समलैंगिक जोड़ों के लिए ऐसा नहीं है. तो हम फिर समान नागरिक कैसे हुए?

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इसी तरह, समलैंगिक जोड़े अपने पार्टनर की मौत के केस में पेंशन के लिए भी दावा नहीं कर सकते. नियम के अनुसार पेंशन का भुगतान इस मामले में वैधानिक रूप से शादीशुदा होने पर ही दिया जाता है और वर्तमान में यह समुदाय समलैंगिक विवाह संबंधी अधिकारों के लिए अदालत में लडाई लड़ रहा है. इसके अलावा, जॉइंट अकाउंट भी ऐसे युगलों के लिए नहीं खुल सकता क्योंकि इसमें भी केवल पति/पत्नी वाला नियम ही है. अगर कोई वसीयत न हो, तो समलैंगिक पार्टनर को उत्तराधिकार के बारे में भी कोई वैधानिक अधिकार नहीं है. क्योंकि अभी उनकी शादी को वैधानिक मान्यता ही नहीं है.

वैधानिक अधिकारों का न होना एक बड़ी समस्या है. कई ताकतें पहले ही समलैंगिक जोड़ों को अलग करने के लिए साजिश कर रही हैं. अगर मैं अपने पार्टनर के साथ अपनी आय और संपत्ति के ब्यौरे साझा नहीं करूं तो किसी भी आपात स्थिति में वह क्या करेगा? योगी ने यह चिंता जताई.

ऊपर बताई गई समस्याओं के अलावा और भी कारण है, जो LGBTQIA+ समुदाय के लोग भारत में समलैंगिक विवाह के अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं:

  • LGBTQIA+ समुदाय के जोड़े फैमिली इंश्योरेंस के लिए पात्र नहीं हैं क्योंकि भारत में समलैंगिक विवाह को मान्यता ही नहीं है इसलिए वे अपने फैमिली स्टेटस को लेकर कोई प्रमाण नहीं दे पाते.
  • सेम सेक्स मैरिज को मान्यता न होने के चलते फैमिली हेल्थ कवरेज या इंश्योरेंस भी नहीं लिया जा सकता. योगी ने कहा,

अगर कबीर अस्पताल में भर्ती होता है, तो उसके दूर के किसी कजिन को मुझसे ज्यादा अधिकार होंगे, जबकि पार्टनर मैं हूं.

  • LGBTQIA+ समुदाय के लोगों को न तो लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की सुविधा उपलब्ध है और न ही कोई मकान या संपत्ति आदि खरीदने के सिलसिले में जॉइंट अकाउंट की. वजह यही है कि हिंदू मैरिज एक्ट 1955 जैसे मौजूदा कानूनों के तहत भारत में समलैंगिक जोड़ों की शादी को मान्यता देने का कोई प्रावधान ही नहीं है.
  • गोद लेने के अधिकार भी समलैंगिक जोड़ों के लिए लगभग असंभव हैं. भारत में, बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया एचएएमए (हिंदू अडॉप्शन्स एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956) और जेजे एक्ट (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) से रेगुलेट की जाती है. एचएएमए के तहत हिंदू, जैन, सिख और अन्य धमों के लोग हिंदू कानूनों के अनुसार बच्चा गोद ले सकते हैं. एक तरफ तो जेजे एक्ट के तहत धर्म के लिहाज से यहां कोई भेदभाव नहीं है, सभी को गोद लेने का अधिकार है. वहीं, एचएएमए के सेक्शन 7 और 8 में अभिभावकों को लेकर उल्लेख है कि वे ‘पति’ और ‘पत्नी’ हों, इस कारण समलैंगिक जोड़ों के लिए यहां भी नाकामी ही हाथ लगती है. यह बात योगी ने बताई.

मैं किसी बच्चे के बारे में सोच भी नहीं सकता. अगर मैं सिंगल पैरेंट के तौर पर भी किसी बच्चे की परवरिश करना चाहूं तो इस बारे में कोई कानून नहीं है जो मेरे बच्चे और मुझे भेदभाव से बचा सके

भारत में गे अधिकारों को लेकर पहले एक्टिविस्ट अशोक रो कावी का कहना है कि सितंबर 2018 में आर्टिकल 377 के खत्म होने से पहले तक इस समुदाय के लोगों को अपराधी माना जाता था और कानून की नजर में ये समान नागरिक की हैसियत नहीं रखते थे.

इस आर्टिकल को खत्म किए जाने से हमें जीने और सबके बीच रहने का अधिकार तो मिला है लेकिन शादी के लिए अभी प्रावधान नहीं हैं. हम बगैर समान अधिकारों के समान नागरिक बना दिए गए हैं. शादी का अधिकार प्राथमिक अधिकार है क्योंकि इससे दूसरे कई नियम कानूनों का लाभ लेने में मदद मिलती है. सेक्शन को हटा दिए जाने के बावजूद अब भी यह समुदाय अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित है.

एक समावेशी समाज के लिए हस्तक्षेप जरूरी है

सबसे पहले समलैंगिकों या इस पूरे समुदाय को लेकर जो एक लांछन जुड़ा हुआ है, उससे छुटकारा पाना होगा.

कावी का कहना है कि अगला महत्वपूर्ण कदम यह है कि लैंगिक समावेशी स्कूल वातावरण को बढ़ावा दिया जाए, जहां छात्र लैंगिकता और सेक्सुअलिटी के बारे में समझें.

इस तरह एक समावेशी संस्कृति विकसित करने से बच्चे तनाव, भेदभाव, धमकाए जाने और अंततः स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभावों से बच सकेंगे.

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उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा में हमें एक समावेशी भाषा को भी जोड़ना चाहिए. उनका सुझाव है कि शैक्षणिक संस्थानों में एक विभाग हो जो सेक्स, सेक्सुअलिटी और जेंडर को लेकर सत्रों का संचालन करे. इस समुदाय के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए हर छह महीने में वकीलों, जजों और स्कूल के फैकल्टी सदस्यों के लिए विस्तृत कोर्स भी चलाया जाना चाहिए.

रवि ने आगे एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया. इस समुदाय की विविधता और उनकी हेल्थ समस्याओं को लेकर मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ के बीच संवेदनशीलता पैदा करने वाले कार्यक्रमों को हेल्थकेयर सिस्टम में संचालित किया जाना चाहिए. अगर कोई भी समलैंगिकों को लेकर भेदभाव करे जैसे जेंडर को लेकर गलत तथ्य या मेडिकल सेवा न देना, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

उम्मीद पर जी रहे योगी और कबीर जैसे युगल

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड विधान से सेक्शन 377 को हटाकर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. इसके बावजूद, शादी के प्रावधान न होने के कारण इस समुदाय के लोगों को सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव को लेकर चिंता बनी हुई है. देश में समलैंगिकों के विवाह को लेकर अच्छी खासी बहस छिड़ी है और यह किस अंजाम तक पहुंचेगी, इसका इंतजार है क्योंकि 2023 में इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संभावित है. वर्तमान में, केंद्र का मूलभूत तर्क यही है कि भारतीय परंपरा, संस्कृति और शादी की व्यवस्था को लेकर सामाजिक ढांचे में समलैंगिक विवाह की स्वीकार्यता नहीं है. इसे लेकर इस समुदाय का उलट तर्क यह है कि समलैंगिक विवाह को सरकार द्वारा मान्यता न दिया जाना समानता और विषमलिंगी युगलों को मिलने वाले लाभ जैसे मामलों में संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है.

योगी और कबीर की मानें तो होम लोन, लाइफ व हेल्थ इंश्योरेंस में पार्टनर को नॉमिनेट करने जैसे कई रास्ते खोलने के लिए समलैंगिक विवाह एक बड़ा उपाय साबित होगा. इस युगल का कहना है कि अब यह समय की मांग है.

अगर मिश्रित नस्ल के जोड़ों को शादी के बजाय नागरिक हिस्सेदारी दी जाती है, मौजूदा कानूनी दायरों के साथ, तो यह भेदभाव ही कहा जाएगा. एक ही लिंग के लोगों की शादी को प्रतिबंधित किया जाना मंजूर नहीं है.” इस युगल का कहना है, “जेंडर को दरकिनार रखते हुए शादी का विकल्प उपलब्ध होना चाहिए

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