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कोई पीछे नहीं रहेगा

एक ‘क्वीर बच्चे’ को स्वीकार करने का एक माता का अनुभव

इस मदर्स डे पर हमने एक क्वीर बच्चे की पैरेंट से बात की. इस दौरान हमने यह जानना चाहा कि ऐसे बच्चे के पेरेंट्स को अपनी भावनाओं से निपटने के लिए कौन सी बातों का पता होना चाहिए और ऐसा बच्चा किस मनः स्थिति से गुजरता है

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एक ‘क्वीर बच्चे’ को स्वीकार करने का एक माता-पिता का अनुभव
आशीष गर्ग एक एजुकेशन फ्यूचरिस्ट और एक नॉन–प्रॉफिट एडवोकेसी प्लेटफॉर्म ‘डिस्कवर टुमॉरो’ कैंपेन की संस्थापक और सीईओ है

नई दिल्ली: आशीष गर्ग ने कहा, ‘2017 में हमें पता चला कि हमारा एक बच्चा क्वीर है, यह किसी झटके से कम नहीं था.’ आशीष गर्ग एक एजुकेशन फ्यूचरिस्ट और एक नॉन–प्रॉफिट एडवोकेसी प्लेटफॉर्म ‘डिस्कवर टुमॉरो’ कैंपेन की संस्थापक और सीईओ है. इसका मकसद सभी स्टेकहोल्डर्स को शिक्षित और उनके बीच जागरूकता पैदा करना है, जो किसी भी क्वीर बच्चे के जीवन को प्रभावित करते हैं.

आशीष गर्ग ने इस बात को कैसे स्वीकार किया, इस दौरान उन्होंने क्या-क्या सीखा और उनकी व्यक्तिगत यात्रा कैसी रही ये जानने के लिए टीम ‘बनेगा स्वस्थ इंडिया’ मदर्स डे पर उनसे बात की. साथ ही ये भी जाना जब कोई बच्चा उनके पास आता है, तो माता-पिता किस तरह से स्थिति को संभाल सकते हैं. वे अपनी खुद की प्रतिक्रिया को किस तरह मैनेज कर सकते हैं और बच्चे के साथ बातचीत कर ये समझ सकते हैं कि बच्चा किस दौर से गुजर रहा है.

जब उन्हें पता चला कि उनका बच्चा क्वीर है, तो पेरेंट्स के रूप में उन शुरुआती दिनों के बारे में विस्तार से बताते हुए आशीष गर्ग ने कहा-

इसे समझने में हमें कुछ महीने जरूर लगे. इस दौरान हम खुद को दोषी समझने लगे थे. हमें लगने लगा कि हमारी तरफ से ही परवरिश में कुछ कमी रह गई होगी. लेकिन जल्द ही हमने इन सारे विचारों को दिमाग से निकाल दिया और अपने बच्चे की बात सुनने लगे. तब हमें अहसास हुआ कि बच्चे को भी बहुत तकलीफ हो रही है और तभी हमने उसका साथ देने का फैसला किया. क्योंकि अगर माता-पिता के रूप में हम अपने बच्चे के साथ खड़े नहीं होंगे तो कोई और भी ऐसा नहीं करेगा.

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आशीष गर्ग ने कहा कि उनके परिवार के लिए स्थिति बहुत अलग थी. क्योंकि भारत में उस समय एलजीबीटीक्यू समुदाय को लेकर चीजें बहुत तेजी से बदल रही थीं. उन्होंने कहा,

यह वह समय था, जब धारा 377 का डिक्रिमिनलाइजेशन यानी कि उसे हटाने की प्रक्रिया जारी थी. इसलिए, हमारे लिए सच्चाई को समझना आसान था. लेकिन, दूसरे माता-पिता की तरह, हम भी शॉक में चले गए थे. दिक्कत यह है कि भारत में इस मसले पर पर्याप्त शिक्षा नहीं मिलती है. हम एक समाज के रूप में इस मुद्दे पर ज्यादा बात ही नहीं करते. इसलिए मुझे खुद को और हमारे जैसे दूसरे परिवारों को शिक्षित करने की जरूरत का अहसास हुआ. इस तरह मेरे अभियान ‘डिस्कवर टुमॉरो’ की शुरुआत हुई.

एक बच्चा जो LGBTQIA+ की श्रेणी में पहचाना गया है, को स्वीकर करने के चरण

जब माता-पिता को उनके बच्चे की अलग पहचान के बारे में पता चलता है, तो आने वाले अलग-अलग पड़ावों और प्रतिक्रियाओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा,

हर चीज की तरह, जाहिर तौर पर यह स्थिति भी अलग-अलग चरणों और प्रतिक्रियाओं के साथ आती है. पहला चरण सदमा है, दूसरा है जब आप इसे ठीक करने की कोशिश करते हैं और तीसरा चरण है जब आप महसूस करते हैं कि यह सब कोई पाप या बीमारी नहीं है और आप इसे ठीक करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं, न ही इसे ठीक करने का कोई तरीका है. यह चरण वह है, जब चीजों को स्वीकार करना शुरू कर देते हैं.

एक क्वीर बच्चे को स्वीकार करने की अहमियत पर जोर देते हुए आशीष गर्ग ने कहा,

दरअसल, इसका समाधान बच्चों को उसी रूप में स्वीकार करना है जो वो मूल रूप से हैं. ये ऐसे बच्चे हैं जो पूरी तरह से सामान्य जीवन के योग्य हैं. अगर वो क्वीर हैं भी तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है. वह पैदा ही ऐसे हुए हैं और जिस दिन आपको इस चीज का एहसास होगा, आपके लिए चीजें सामान्य हो जाएंगी.

एक क्वीर बच्चे के मुद्दे

आशीष गर्ग कहती हैं,

एक क्वीर बच्चे के लिए जीवन चुनौतियों से भरा हुआ है. ये बच्चे तनाव से भरे हुए होते हैं. वे स्कूल और बाहर दोनों जगह बरसों से स्वीकार नहीं किए गए, डराने-धमकाने से त्रस्त होते हैं. उनकी इच्छा बस इतनी है कि परिवार उन्हें स्वीकार करे और प्यार दे. जब यह उन्हें अपने परिवारों में नहीं मिलता है, तो उन्हें बहुत सारी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

उन्होंने आगे कहा कि जब आप उन्हें स्वीकार कर प्यार करना शुरू करते हैं तो ये बच्चे अपनी पूरी काबिलियत का फायदा उठा पाते हैं. वो तब अपने जीवन में अद्भुत चीजें कर सकते हैं और बड़े पैमाने पर समुदाय के प्रति योगदान दे सकते हैं.

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LGBTQIA+ बच्चे को स्वीकार करना: माता-पिता और समाज इसमें कैसे और सहयोगात्मक हो सकते हैं

एक क्वीर बच्चे के माता-पिता होने के चलते अपनी यात्रा में जो कुछ उन्होंने सीखा, उसके बारे में बात करते हुए आशीष गर्ग ने कहा,

यह सुनकर माता-पिता गहरे सदमे में चले जाएं यह सामान्य है. लेकिन फिर, हमें इन चीजों से सीखने और उससे आगे देखने की जरूरत है.

एक उदाहरण देते हुए आशीष गर्ग ने कहा कि जब एक बच्चा पैदा होता है और आप उसे पहली बार गोद में लेते हैं, तो आप उसके लिंग के बारे में नहीं सोचते. आप उसके समलैंगिक, ट्रांसजेंडर या कुछ भी और होने के बारे में नहीं सोचते हैं. उन्होंने आगे कहा कि आपको बस यही करना यह है कि आप अपने बच्चे को अपने करीब लें, उन्हें प्यार करें और उनके भले की प्रार्थना करें. उन्होंने कहा,

तो जब वो खुद के बारे में बताते हैं तो हम अलग तरह से प्रतिक्रिया क्यों देने लगते हैं? हम डर के कारण व्यवहार या प्रतिक्रिया में क्यों बदलाव ले आते हैं? समाज बच्चे को स्वीकार नहीं करेगा, उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी, या वे शादी नहीं कर पाएंगे, जैसे सवाल हमारे मन में उठने लगते हैं. मुझे लगता है, इनमें से ज्यादातर हमारे आस-पास के माहौल की वजह से होता है जैसे ही माहौल बदलेगा, तो स्वीकार करने की हिम्मत भी आ जाएगी.

उन्होंने क्वीर बच्चे के माता-पिता को सलाह दी कि वे बेचैन न हों और गैरजिम्मेदारी से पेश आने से बचें. उन्होंने कहा,

यह न तो आपके बच्चे की गलती है और न ही आपकी गलती है. इस मुद्दे पर खुद को शिक्षित करना शुरू करें. आपको अपने बच्चे के साथ खड़ा होना चाहिए – जैसे ही आप उनके बर्ताव में फर्क देखते हैं, तो आपको स्कूल कोऑर्डिनेटर या काउन्सलर से संपर्क करना चाहिए. ये ऐसे चीजें हैं जो बहुत अहम हैं, पर जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. क्योंकि शुरू में जो भी होगा, वो चीजें आपके बच्चे के मन पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगी.

आशीष गर्ग ने समाज और समुदाय के बारे में बात करते हुए स्कूली पाठ्यक्रम में एलजीबीटीक्यू समुदाय को शामिल करने पर जोर दिया और कहा

हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि सभी एक समान है. हमें भी स्वीकार करना और एक साथ रहना सीखना होगा, यही एक समावेशी समाज का आधार है. स्कूल स्तर पर एलजीबीटीक्यू समुदाय को स्वीकार करना शुरू कर देना चाहिए. हम अपने बच्चों को स्कूल से ही दहेज प्रथा, सती प्रथा जैसी सभी सामाजिक बुराइयों और जीवन एवं मृत्यु के बारे में पढ़ाते हैं, लेकिन इन सब में हम तीसरे लिंग को शामिल नहीं करते हैं. हम उन्हें इस समुदाय के बारे में नहीं पढ़ाते हैं और इसलिए स्कूल में ऐसे बच्चों को डराया -धमकाया या फब्तियां कसी जाती हैं.”

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भारत में एलजीबीटीक्यू समुदाय – हम कहां हैं

आशीष गर्ग कहती हैं कि वास्तव में भारत के लिए समस्या बहुत बड़ी है. उन्होंने आगे कहा,

भारत में 7-8 प्रतिशत आबादी है, जिसकी अब अलग-अलग लिंग के रूप में पहचान हो चुकी है. यह बहुत बड़ी संख्या है. समस्या यह है कि अगर हम इस तबके को मुख्यधारा से दूर रखेंगे, तो हमारी समग्र अर्थव्यवस्था को भी नुकसान होगा. पिछले सालों में कई रिपोर्ट और अध्ययन किए गए हैं जो इस संकट को उजागर करते हैं. इस बीच विश्व बैंक भी यह कहता है कि भारत में क्वीर पर डेटा की कमी है.

विश्व बैंक की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आशीष गर्ग ने कहा,

क्या आप जानते हैं, होमोफोबिया के कारण भारत को सालाना 30.8 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है?

आशीष गर्ग आगे कहती हैं कि वैसे तो हमारे देश में इन मुद्दों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं और इस विषय पर भारत में बहुत कुछ अच्छा भी हुआ है, लेकिन समस्या यह है कि जमीनी हकीकत नहीं बदल रही है. वह कहती हैं,

अगर आज एलजीबीटीक्यू समुदाय का कोई भी व्यक्ति, एक अपार्टमेंट किराए पर लेने या घर खरीदने जाता है, तो 99 प्रतिशत चांसेस रहते हैं कि उन्हें नहीं मिलेगा. हमारे स्कूलों में हो रही बदतमीजी के बारे में कोई भी बात नहीं कर रहा है. इसको लेकर एक अजीब सा सन्नाटा है. अगर बच्चा खुलकर सामने आता भी है, तो ज्यादातर अभिभावकों को बुलाकर, बच्चे को स्कूल से निकालने के लिए कहा जाता है. इसलिए, इस इकोसिस्टम को बदलने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. फिलहाल कुछ ही ऐसी मल्टीनेशनल आर्गेनाईजेशन्स हैं, जो वास्तव में एलजीबीटीक्यू समुदाय को काम पर रखते हैं और मिल जुलकर रहने का माहौल बनाते हैं.

भविष्य का मार्ग

आशीष गर्ग ने इस मसले पर अपनी अंतिम बात रखते हुए कहा,

इन सब मुद्दों को ठीक कर आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका LGBTQ समुदाय के बारे में लोगों को अधिक जानकारी देना है और यह सबसे पहले उन्हें स्वीकार करने से शुरू होगा. आज की पीढ़ी वास्तव में तय करेगी कि हमारे देश के लिए लिंग विविध समूह एक दायित्व बन जाएंगे या डेमग्रैफिक डिविडेंड. यह वह पीढ़ी है जो इक्विटी, विविधता और समावेशन के मामले में, भारत का वास्तव में कल क्या होगा, इसका एक प्रमुख निर्माण कर सकती है.

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