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डेटॉल-बनेगा स्वस्थ इंडिया का “बजेगी घंटी, धुलेंगे हाथ” पाठ्यक्रम वाराणसी में बच्चों के जीवन को कैसे बदल रहा है

डेटॉल स्कूल स्वच्छता पाठ्यक्रम की शुरुआत 2014 में सिर्फ 2,500 स्कूलों में पाठ्यक्रम के लॉन्च के साथ हुई थी. आज यह 840,000 स्कूलों और 500,000 मदरसों में 24 मिलियन बच्चों तक पहुंच गया है

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डेटॉल-बनेगा स्वस्थ इंडिया का "बजेगी घंटी, धुलेंगे हाथ" पाठ्यक्रम वाराणसी में बच्चों के जीवन को कैसे बदल रहा है
डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया हाइजीन पाठ्यक्रम का लाभ बच्चे उठा रहे हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों को जागरूक करना और बताना है कि कैसे और कब हाथ धोना है.

नई दिल्ली: “काश हर बच्चा हाथ धोने के बारे में बुनियादी बातें जानता. पिछले कुछ सालों में मैंने हेल्दी रूटीन के महत्व को समझा है, जैसे कि खाना खाने से पहले और बाद में, साथ ही शौचालय का उपयोग करने से पहले और बाद में हाथ धोना. ये शब्द वाराणसी के प्राथमिक विद्यालय सिहोरवा में पढ़ने वाले कक्षा 5 के छात्र 11 वर्षीय विद्यार्थी अमन पटेल के हैं.

उसी स्कूल की एक और छात्रा, आस्था पटेल कहती हैं,

जब से मैंने हाइजीन रूटीन का पालन करना शुरू किया है, तब से मैं बीमार नहीं पड़ी. हमने रोज हाइजीन रूटीन का पालन करते हुए, उसके महत्व को समझा है.

टीम ‘बनेगा स्वस्थ इंडिया’ ने जब इन छात्रों से पूछा कि उन्होंने स्वस्थ रहने की इन आदतों को कैसे सीखा? तो उन्होंने जवाब दिया,

यह बजेगी घंटी, धुलेंगे हाथ पाठ्यक्रम के वजह से है, जिसे हमारे स्कूल में डेटॉल बनेगा स्वस्थ भारत स्वच्छता पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में लागू किया गया है. पाठ्यक्रम के इस हिस्से के रूप में, हमारा स्कूल लंच-टाइम के समय, छह बार घंटी बजाता है. ये हमारे लिए कक्षाओं से बाहर आकर हाथ धोने के छह-चरणीय रूटीन के पालन करने का संकेत होता है.

इस स्कूल के विद्यार्थी वाराणसी के कई अलग-अलग स्कूलों के हजारों अन्य विद्यार्थियों में शामिल हैं, जो डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया हाइजीन पाठ्यक्रम का लाभ उठा रहे हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों को जागरूक करना और बताना है कि कैसे और कब हाथ धोना है. इन स्कूलों में सभी स्टूडेंट्स को साबुन और पानी जैसी बुनियादी चीजें उपलब्ध हैं – ये पहल एक ऐसे देश में काफी महत्वपूर्ण है जहां 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण डायरिया है.

वाराणसी के चिरईगांव ब्लॉक के प्रखंड शिक्षा मंत्री स्कंद गुप्ता ने वाराणसी में इस कार्यक्रम के प्रभाव बारे में बात करते हुए कहा,

2016 में राज्य में इसे सिर्फ 100 स्कूलों में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लॉन्च किया गया था. अब यह संख्या लगभग 1000 स्कूलों तक बढ़ गई है.यह कार्यक्रम लगभग 1.5 लाख छात्रों को प्रभावित कर रहा है. इससे हमें समाज में काफी सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं, जैसे स्कूल में गैरहाजरी में काफी गिरावट आई है.

कार्यक्रम को 360-डिग्री एप्रोच के साथ कैसे लागू किया गया है, यह बताते हुए उन्होंने आगे कहा,

इस कार्यक्रम ने इन स्कूलों के कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने में मदद की. इसके तहत शिक्षकों को सिखाया गया कि कैसे वे मजेदार और दिलचस्प तरीके से स्वच्छता का पाठ पढ़ा सकते हैं, ताकि छात्र इसका पालन करें. स्कूली छात्रों द्वारा स्वच्छता की बुनियादी बातें सीखने के साथ, हमने इसका संदेश समाज में जाते हुए देखा क्योंकि छात्रों ने अच्छी आदतों को अपने घर पर भी लागू करना शुरू कर दिया और अपने परिवारों को स्वस्थ दिनचर्या का पालन करने के लिए मजबूर किया.

एक स्कूल टीचर नीलम राय ने ‘डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों के महत्व पर रोशनी डालते हुए कहा,

डेटॉल बनेगा स्वस्थ इंडिया’ पाठ्यक्रम जैसे कार्यक्रमों का फायदा यह है कि यह शुरुआती दौर में ही अच्छी आदतें डालने में मदद करता है. बच्चों में बड़ी पीढ़ी के जीवन को बदलने और प्रभावित करने की क्षमता होती है. वे समाज और अपने घर के अलावा युवा पीढ़ी को और यहां तक कि अपने उन दोस्तों को भी स्वच्छता के बारे में समझा सकते हैं, जो स्कूल में नहीं पढ़ रहे हैं. इस तरह, लोगों के एक बड़े वर्ग को सरल बुनियादी स्वच्छता के बारे में जागरूक किया जा सकता है और साथ मिलकर हम एक स्वस्थ समाज के निर्माण में मदद कर सकते हैं.

डेटॉल स्कूल स्वच्छता पाठ्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी –

इस पहल की शुरुआत 2014 में सिर्फ 2,500 स्कूलों में पाठ्यक्रम के लॉन्च के साथ हुई थी. आज यह 840,000 स्कूलों और 500,000 मदरसों में 24 मिलियन बच्चों तक पहुंच गया है.

पाठ्यक्रम नए और प्रभावशाली तरीकों से स्वच्छता के बारे में समझ और उसकी आदत के महत्व पर प्रकाश डालने का काम कर रहा है, जैसे –

– हाइजीन बडी किट्स (Hygiene Buddy Kits), जो अनुभव आधारित सीखने पर जोर देता है एवं STEM यानि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के हिसाब से सोचने को बढ़ावा देता है. इन किट में बच्चों के लिए मजेदार खेल, जैसे “साबुन का आटा” और “कीटाणु कैसे फैलते हैं” शामिल हैं, जो NLP यानि न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग के माध्यम से सीखने को प्रोत्साहित करते हैं.

– स्वच्छता के विज्ञान को कॉमिक बुक्स के माध्यम से पढ़ाना, चाचा चौधरी और साबू जैसे पसंदीदा और किरदारों के माध्यम से बच्चों के साथ जुड़ना

– हाइजीन प्ले पार्कों का निर्माण, जो व्यवहार में बदलाव लाने के लिए खेल-खेल में सिखाने के तरीके का उपयोग करने वाली अपनी तरह की अनूठी पहल है. यह पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से स्वास्थ्य के प्रति जरूरी जागरूकता पैदा करता है.

– हर स्कूल में हाइजीन कॉर्नर की स्थापना, जहां स्वच्छता के लिए जरूरी सामान जैसे साबुन, हैन्ड- वाश, बाल्टी, पानी के मग, तौलिये, स्टूडेंट्स की वर्कबुक, शिक्षकों के मैनुअल, पोस्टर, एक प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स और अन्य चीजों को रखा जाता है. इन हाइजीन कॉर्नर्स का मकसद, छात्रों को हाइजीन के तहत ‘कैसे और क्यों’ के बारे में जानकारी देना है.

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