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सुंदरबन में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को प्रभावित करती है भौगोलिक अतिसंवेदनशीलता

सुंदरबन के 19 ब्लॉक उत्तर 24 और दक्षिण 24 परगना जिलों में विभाजित हैं. स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने के लिए, नावों के माध्यम से जल निकायों को पार करना पड़ता है

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Geographical Vulnerability, A Make Or Break For Access To Healthcare In Sundarbans
भारतीय सुंदरबन में स्वास्थ्य सेवाओं तक खराब पहुंच के कारणों में से एक परिवहन है

नई दिल्ली: सुंदरबन भौगोलिक रूप से एक संवेदनशील स्थान है क्योंकि यह नियमित रूप से प्राकृतिक आपदाओं को झेलता है और डेल्टा की यह अतिसंवेदनशीलता अक्सर इसके खिलाफ काम करती है और स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच को प्रभावित करती है. जब हाई टाइड, तूफान और चक्रवात जीवन और आजीविका को छीन लेते हैं, तो स्वास्थ्य सेवा की मांग पीछे छूट जाती है. उसी के बारे में बात करते हुए, डॉ. समीरन पांडा, अतिरिक्त महानिदेशक, ICMR और महामारी विज्ञान और संचारी रोगों के प्रमुख, जिन्होंने सुंदरबन पर शोध किया है, ने कहा, “एक क्षेत्र में आबादी की क्रय शक्ति जो तबाह हो जाती है, स्वाभाविक रूप से बार-बार नीचे जाएगी. यह उनकी आजीविका पर बार-बार हमला करने जैसा है. आपके पास एक स्थिर स्वास्थ्य केंद्र हो सकता है, लेकिन कई लोगों के लिए इसे एक्सेस करना मुश्किल है. जल निकायों को पार करना पड़ता है जिसमें समय लगता है.”

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दक्षिण 24 परगना के पथरप्रतिमा उप-मंडल में स्थित रामनगर आबाद गांव की 32 वर्षीय संजुक्ता मन्ना एक एनजीओ द्वारा संचालित स्कूल में काम करती हैं और प्रशासन के काम से जुड़ी हैं. वह नदी के पास रहती है, जिसका अर्थ है कि वह तूफानों और चक्रवातों के दौरान सबसे अधिक प्रभावित पीड़ितों में से एक है. उनके घर से लगभग 4 किमी दूर एक स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन आपात स्थिति के लिए, उन्‍हें अपने घर से 20 किमी दूर डायमंड हार्बर में स्थित एक सरकारी अस्पताल जाना पड़ता है. 10 मई को, जब उनके किसान पति का एक्सीडेंट हो गया और उन्हें सिर में चोट लग गई, तो उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाना पड़ा. उनका मानना है कि इलाज में देरी के कारण उनके पति के सिर में खून का थक्का जम गया है. फिलहाल उनके पति का कोलकाता में इलाज चल रहा है, लेकिन संजुक्ता के लिए परिवार की खराब आर्थिक स्थिति चिंता का विषय है.

40 वर्षीय सुलोता फुरकित सुंदरबन के गोसाबा में होटल सोनार बांग्ला के बगल में एक चाय की दुकान चलाती हैं. दो साल पहले, अपने पति के पैर में चोट लगने के बाद, सुलोता ने अपने घर की बागडोर संभाली और एक चाय की दुकान खोली, जहां वह गेस्‍ट की मांग पर फ्लैटब्रेड, अंडे, केकड़े, जैसे अन्य अनुकूलित भोजन भी बनाती हैं. दो लड़कियां जो विवाहित हैं, और एक बेटा जो अब एक मजदूर है की मां सुलोता ने बताया कि गोसाबा में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचने के लिए उसे नाव से एक घंटे का सफर तयर करना पड़ता है. गहन देखभाल के लिए उसे कोलकाता जाना पड़ता है.

अपनी चाय की दुकान में बैठी सब्जियां काटती और गेस्‍ट के लिए रात का खाना बनाती सुलोता फुरकैत

स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों की पुष्टि करते हुए, बशीरहाट स्वास्थ्य जिले के चिकित्सा अधिकारी डॉ. सौरव मंडल ने कहा,

हमने चिकित्सा शिविर किए हैं और पाया है कि लोग अपना पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं तक खराब पहुंच का एक कारण परिवहन है. अगर किसी को हार्ट अटैक आता है, तो अक्सर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसकी मौत हो जाती है. प्रसव पीड़ा के दौरान महिलाओं को नदी पार करनी पड़ती है.

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धीरस कुमार चौधरी, जराचिकित्सा और सामान्य चिकित्सक और सुंदरबन में दो दशकों से अधिक समय से काम कर रहे एनजीओ बांचबो के अध्यक्ष ने बताया कि बुजुर्ग और बाली द्वीप, घोरामारा या बंगाल की खाड़ी के करीब के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा पीड़ित हैं. इसका कारण, सेवाओं और परिवहन की कमी है. उन्‍होंने कहा,

वृद्ध लोग अपनी उम्र के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं जा सकते हैं और उनके लिए परिवहन एक और चुनौती है. कई बुजुर्ग पुरानी बीमारियों, हाई बीपी, डायबिटीज, थायराइड और यहां तक कि कैंसर से भी पीड़ित हैं. उन्हें रेगुलर चेकअप की आवश्यकता होती है जो खराब पहुंच के कारण पूरी नहीं होती. निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए पैसे की आवश्यकता होती है लेकिन निवासियों की खराब आर्थिक स्थिति उनके दुख को और बढ़ा देती है.

मौजूदा चुनौतियों के कारण, सुंदरबन के लोगों को स्थानीय गैर सरकारी संगठनों की दया पर छोड़ दिया गया है, जो दैनिक कार्यों के लिए धन पर निर्भर हैं. उदाहरण के लिए, 1997 में, एम ए वोहाब के नेतृत्व में एनजीओ SHIS (दक्षिणी स्वास्थ्य सुधार समिति) ने इस क्षेत्र के लोगों की सेवा के लिए एक तैरती नाव औषधालय शुरू किया. इस पहल का विस्तार चार बोट क्लीनिकों तक हुआ, हर नाव एक दिन में एक गांव कवर करती थी.

सुंदरबन के लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए SHIS फाउंडेशन द्वारा मोबाइल बोट डिस्पेंसरी

जब सरिता गाइन को त्वचा रोग हो गया, जिसके परिणामस्वरूप उनके हाथ और पैर फूल गए, तो वह SHIS फाउंडेशन द्वारा संचालित एक बोट क्लिनिक में आई. उन्‍होंने कहा,

मच्छर के काटने से भी मेरे पूरे शरीर पर धब्बे पड़ जाते हैं. मेरे परिवार में ऐसा कोई नहीं है जो मुझे शहर के सरकारी या निजी क्लीनिक में ले जाए, इसलिए मैं इस नाव पर इलाज कराने आती हूं. यहां के डॉक्टर अच्छे हैं.

सरिता जैसे कई लोग हैं जो या तो विकल्पों की कमी के कारण या पैसे के कारण स्थानीय स्तर पर इलाज का सहारा लेते हैं. धीरेस कुमार चौधरी ने अपने एनजीओ के माध्यम से मानसिक बीमारी के भी मरीज पाए हैं. उनका मानना है कि चक्रवातों और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की नियमित घटना के सबसे उपेक्षित स्वास्थ्य प्रभावों में से एक मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव है. उन्‍होंने कहा,

हम पाथरप्रतिमा ब्लॉक में मासिक जराचिकित्सा ओपीडी करते हैं और वहां हम कई रोगियों को ऐंगज़ाइटी और अनिद्रा की शिकायत करते हुए देखते हैं जो उनके ब्‍लड प्रेशर और ब्‍लड शूगर के लेवल को प्रभावित करता है. बुजुर्ग अपने परिवार, अपनी आर्थिक स्थिति और भविष्य में आने वाले चक्रवातों के संभावित प्रभाव को लेकर चिंतित हैं. हर तूफान के बाद, हम देखते हैं कि लोगों में मानसिक बीमारी की शिकायत बढ़ रही है. COVID के बाद न्यूनतम स्वास्थ्य सेवा की पहुंच में कमी आई है.

पश्चिम बंगाल, सुंदरबन: एक युवती ने चेक-अप के लिए मोबाइल बोट डिस्पेंसरी में अपना पंजीकरण कराया

सुंदरबन के पचास लाख लोगों के उत्थान के लिए क्या किया जा सकता है? डॉ. पांडा न केवल समस्या की पहचान करते हैं बल्कि समाधान खोजने में स्वदेशी भागीदारी की सिफारिश करत हैं. और यह सामुदायिक जुड़ाव के माध्यम से किया जा सकता है.

अगर आपको यह पहचानना है कि लोगों को भोजन से आयरन को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में क्या मदद मिल सकती है, तो आपको उनकी खाने की आदतों को जानना होगा. उदाहरण के लिए, चावल उनका मुख्य भोजन है जिससे वे कार्बोहाइड्रेट लेते हैं लेकिन प्रोटीन का क्या? क्या उनकी दालों तक पहुंच है जो प्रोटीन का शाकाहारी स्रोत है या प्रोटीन का कोई पशु स्रोत है? उनके साथ काम करके समाधान खोजना होगा. बाहर से आयातित समाधान मदद नहीं करते हैं. हम एक ऐप बना सकते हैं और तकनीक का उपयोग कर सकते हैं, विशेष रूप से मोबाइल फोन यह जानने के लिए कि वे क्या खा रहे हैं और क्या उनकी मदद कर सकते हैं और इसके बाद उनकी डाइट में बदलाव कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी और सामुदायिक जुड़ाव की कुंजी है.

डॉ. सुगत हाजरा, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज, जादवपुर विश्वविद्यालय का कहना है कि डेल्टा को बचाने का एक ही तरीका है – मानव और मैंग्रोव दोनों – सुंदरबन में मीठे पानी को वापस लाएं. उन्होंने कहा कि अगर हमारे पास ताजा पानी है तो हम किसी भी संकट, यहां तक कि जलवायु परिवर्तन से भी निपट सकते हैं.

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निष्कर्ष

सुंदरबन में कुल 19 ब्लॉक हैं, जिनमें से 13 दक्षिण 24 परगना जिले में और 6 उत्तर 24 परगना जिले में आते हैं. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तर 24 परगना में 112 बेड के साथ 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएफसी) और दक्षिण 24 परगना में 239 बेड के साथ 31 पीएचसी हैं.

2014 में इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल ऑफ सोशल साइंसेज में प्रकाशित “सुंदरबन, पश्चिम बंगाल, भारत में स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे में स्थानिक असमानता” नामक एक अध्ययन के अनुसार, एक भी ब्लॉक ऐसा नहीं पाया गया है जहां एक पीएचसी द्वारा 30,000 से कम व्यक्तियों को सेवा दी जाती है. इसके विपरीत, चार ब्लॉक कैनिंग- I और II, काकद्वीप और जयनगर- ऐसे ब्‍लॉक हैं जहां प्रति पीएचसी की आबादी मौजूदा मानदंडों की तुलना में चार गुना से अधिक है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत ग्रामीण इलाकों में 30,000 और पहाड़ी, आदिवासी और रेगिस्तानी इलाकों में 20,000 की आबादी को कवर करने के लिए पीएचसी की स्थापना की गई है.

एनडीटीवी ने सुंदरबन में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे और लोगों के उत्थान के लिए सरकार द्वारा की जा रही पहलों को समझने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक डॉ. सिद्धार्थ नियोगी से संपर्क किया. उन्‍होंने कहा,

सुंदरबन के लिए, हमारे पास दक्षिण 24 परगना के कैनिंग उप-मंडल में बसंती में एक अस्पताल है. हमने नाव पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है. एक वेटिंग हब है जहां गर्भवती महिलाएं डिलीवरी से पहले इंतजार कर सकती हैं. सुंदरबन में स्वास्थ्य कोई समस्या नहीं है. मुद्दा जंगल के पास रहने वाले लोगों का है और हम उनकी मदद नहीं कर सकते. हमारे पास स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जो सब-सेंटर्स में जाते हैं.

डॉ. नियोगी ने इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी या मौजूदा सुविधाओं के बारे में कोई डेटा साझा नहीं किया.

जून 2020 में, एक समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नीति आयोग से आग्रह किया है कि वह लगातार चक्रवातों से तबाह हो रहे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सुंदरबन के लिए एक मास्टरप्लान की तैयारी शुरू करने के लिए एक अंतर-अनुशासनात्मक टीम बनाए. पीटीआई के हवाले से उन्होंने कहा,

मैं नीति आयोग से अनुरोध करना चाहती हूं कि कृपया इस पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास के सभी पहलुओं को कवर करने वाले विशेषज्ञों की एक अंतर-अनुशासनात्मक टीम द्वारा एक मास्टर प्लान तैयार करने के लिए बनाएं.

कुछ न्‍यूज रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने आपात स्थिति में रोगियों के जल्‍दी ट्रांसर्पोटेशन में सहायता के लिए एक वॉटर एम्बुलेंस सेवा भी शुरू की है. जैसे-जैसे जलवायु संकट अधिक से अधिक चुनौतियों दे रहा है, इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में सुधार के लिए इन उपायों का कितना प्रभाव पड़ेगा, यह देखने वाली बात है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए एक त्वरित और ठोस प्रयास की आवश्यकता है. इस क्षेत्र के लोग फ्रंटलाइन पर रह रहे हैं. जलवायु संकट से होने वाले उथल-पुथल के पास वह सब है जो उन्हें इस अस्तित्व के संकट से बचने के लिए चाहिए.

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