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वायु प्रदूषण

जानिए बढ़ते वायु प्रदूषण का आपके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है और इससे खुद को कैसे बचाएं

प्रदूषित हवा में सांस लेने से लोगों के स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं – जैसे उन्हें सर्दी और खांसी से लेकर अस्थमा जैसी गंभीर सांस संबंधी बीमारियां तक हो सकती हैं

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Impact Of Worsening Air Pollution And How To Protect Yourself From It
हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) एक औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी को 5.3 साल कम कर देता है: एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI)

नई दिल्ली: क्या आप जानते हैं, भारत दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश है? शिकागो यूनिवर्सिटी के ऊर्जा नीति संस्थान (Energy Policy Institute at the University of Chicago – EPIC) द्वारा निर्मित वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (Air Quality Life Index – AQLI) का कहना है कि अगर हवा में PM2.5 का स्तर WHO की एयर क्वालिटी गाइडलाइन के मुताबिक न हो, तो PM2.5 एक औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा (Life expectancy) को 5.3 साल कम कर देता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की गाइडलाइन के मुताबिक PM2.5 का सालाना औसत 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (5 micrograms per cubic meter) से ज्यादा नहीं होना चाहिए. लेकिन देश की राजधानी दिल्ली बढ़ते प्रदूषण की वजह से दुनियाभर में बदनाम हो रही है. हालांकि सिर्फ दिल्ली ही नहीं मुंबई, कोलकाता, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से, राजस्थान और हरियाणा सहित देश के कई और शहर भी जहरीली हवा से बचे नहीं हैं, उनका एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ‘बहुत खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी के बीच बना हुआ है.

एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI) यह भी कहता है कि यदि भारत WHO की गाइडलाइन को मैच करने के लिए पार्टिकुलेट पॉल्यूशन यानी कण प्रदूषण को कम कर लेता है, तो दिल्ली में रहने वालों की जीवन प्रत्याशा (life expectancy) 11.9 साल बढ़ जाएगी. उत्तरी 24 परगना में – जो देश का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला जिला है – वहां के लोगों की जीवन प्रत्याशा (Life expectancy) 5.6 साल बढ़ जाएगी. जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी एक व्यक्ति के औसत जीवनकाल का अनुमान होता है.

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लेकिन सच तो यह है कि हम जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं जिससे हमारी उम्र कम हो रही है. भारत में अभी वायु प्रदूषण का मौसम है, जो अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी लेकर आया है – जैसे सर्दी और खांसी से लेकर कई तरह की गंभीर सांस संबंधी समस्याएं. फोर्टिस अस्पताल में क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन, कंसल्टेंट – इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी (Consultant – Interventional Pulmonology) डॉ. सचिन डी ने बताया कि अस्पतालों में मरीजों की संख्या और इमरजेंसी मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है. उन्होंने कहा,

मरीजों की संख्या में कम से कम 15-30 फीसदी बढ़ोतरी का कारण वायु प्रदूषण हो सकता है.

वायु प्रदूषण से होने वाले प्रभाव

टीम बनेगा स्वस्थ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में, डॉ. सचिन ने वायु प्रदूषण से हमारे स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभाव को समझाने के लिए पहले बताया कि पार्टिकुलेट मैटर क्या होता है और ये कैसे हमें प्रभावित करता है. उन्होंने कहा, “पार्टिकुलेट मैटर 2.5 (PM2.5) हवा में मौजूद कार्बन पार्टिकल्स का सूक्ष्म अंश (Fine fraction) होता है. इसमें कई कैमिकल और मेटल होते हैं. जब हम सांस लेते हैं तो हवा के साथ ये केमिकल और मेटल हमारे शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं. PM2.5 पार्टिकल्स शरीर के अंदर पहुंचकर खून में मिल जाते हैं और हृदय (Heart), मस्तिष्क (Brain) और अग्न्याशय (Pancreas) सहित शरीर के विभिन्न हिस्सों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस यानी तनाव पैदा करते हैं. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का मतलब शरीर में फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच असंतुलन होना है, जिससे कोशिका और ऊतकों को नुकसान हो सकता है.”

वायु प्रदूषण से होने वाले शॉर्ट टर्म इफेक्ट पर एक नजर

  • आंखों में जलन (Burning of eyes)
  • नाक बहना (Runny nose)
  • गला में खराश (Sore throat)
  • घुटन (Suffocation)
  • छाती में जमाव (Chest congestion)
  • खांसी (Cough)

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डॉ. सचिन ने अपनी बात में जोड़ा,

प्रदूषित हवा में जाने पर कुछ लोगों को क्लॉस्ट्रोफोबिक (Claustrophobic) या सीने में जकड़न महसूस हो सकती है. हम इसके लॉन्ग टर्म इम्पैक्ट यानी लंबे समय तक रहने वाले प्रभावों को लेकर ज्यादा चिंतित हैं. वायु प्रदूषण अस्थमा, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस से पीड़ित लोगों पर ज्यादा प्रभाव डालता है. इन मरीजों को बार-बार दौरे पड़ सकते हैं और लगातार खांसी हो सकती है और हमारे पास ऐसे मामले आ रहे हैं. पहले, वायरल फीवर होने पर लोगों को पांच से सात दिनों तक गले में खराश रहती थी और अब, खांसी एक महीने से ज्यादा समय तक रहती है.

डॉ सचिन ने कहा कि वायु प्रदूषण न केवल फेफड़ों को प्रभावित करता है, बल्कि एक्स्ट्रा-पल्मोनरी इफेक्ट (Extra-pulmonary effects) भी डालता है. सूक्ष्म कण जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) कहा जाता है, सर्कुलेटरी सिस्टम (Circulatory system) यानी परिसंचरण तंत्र में प्रवेश करते हैं और नीचे बताई गई समस्याओं की वजह बनते हैं:

  • खून की कमी (Anaemia)
  • हार्ट अटैक (Heart attack)
  • स्ट्रोक (Stroke)
  • डिमेंशिया (Dementia)
  • याददाश्त कम होना (Loss of memory)
  • पार्किंसंस बीमारी (Parkinson’s disease)
  • भूलने की बीमारी (Alzheimer’s)
  • बांझपन (Infertility)
  • जन्म संबंधी समस्याएं (Birth-related issues)
  • कई तरह के कैंसर (Variety of cancers)
  • मधुमेह (Diabetes)

गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर वायु प्रदूषण के प्रभाव के बारे में बात करते हुए डॉ. सचिन ने कहा,

गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से बच्‍चे का वजन कम होना, समय से पहले बच्‍चे का जन्‍म होना, बांझपन और गर्भपात हो सकता है. वायु प्रदूषण नवजात शिशुओं के फेफड़ों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करता है और यह एक स्टडी ने साबित किया है. इस स्टडी में ज्यादा AQI वाले क्षेत्र में बढ़ रहे बच्चों की तुलना में कम AQI वाली क्षेत्र में बढ़ते बच्चों की फेफड़ों की क्षमता का मूल्यांकन किया गया था. इस स्टडी में पाया गया कि ज्यादा प्रदूषित वातावरण में रहने वाले बच्चों के फेफड़ों की क्षमता यानी लंग कैपेसिटी कम थी. इसलिए प्रदूषण के समय नवजात शिशुओं और बच्चों की खास देखभाल करनी जरूरी है.

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घर के अंदर का वायु प्रदूषण

इस आम मिथक को तोड़ते हुए कि इनडोर प्लांट यानी घर के अंदर लगाए गए पौधे घर के अंदर की हवा को शुद्ध करने में मदद करते हैं, डॉ. सचिन ने कहा कि इनडोर प्लांट वायु प्रदूषण को कम करने में मदद नहीं करते हैं. बल्कि इनडोर प्लांट घर के अंदर पराग (Pollen) और कवक बीजाणुओं (Fungal spores) की मात्रा बढ़ाने में योगदान करते हैं.

यह अस्थमा के मरीजों और एलर्जी वाले लोगों के लिए बहुत खतरनाक है.

डॉ. सचिन ने कहा कि घर के अंदर वायु प्रदूषण मुख्य तौर पर घर के अंदर बायोमास जलाने और धूम्रपान यानी स्मोकिंग करने की वजह से होता है. इसके अलावा, फर्श और दूसरी सतहों को साफ करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कीटाणुनाशक एजेंटों में खतरनाक गैसें होती हैं, जो प्रदूषण को बढ़ाती हैं.

घर के अंदर वायु प्रदूषण को कम करने के लिए ये तरीके अपनाएं:

  • अपने घर को धूल-मुक्त (Dust-free) रखें
  • दरवाजे और खिड़कियां बंद रखें
  • एयर कंडीशनर या एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें
  • एब्जॉबिंग और एब्जॉबिंग प्रोपर्टी वाले एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें, जिसका मतलब है कि उसमें PM2.5 और घर के अंदर उत्पन्न होने वाली जहरीली गैसों को एब्जॉर्ब करने के लिए HEPA फिल्टर और कार्बन फिल्टर होना चाहिए.

वायु प्रदूषण से खुद को कैसे बचाएं?

  • अगले दो से तीन महीनों तक बाहर जाने से बचें. फेफड़ों और हृदय से संबंधित बीमारियों वाले लोगों को घर के अंदर ही रहने की कोशिश करनी चाहिए.
  • बाहर निकलते समय N-95 मास्क पहनें. लेकिन याद रखें, केवल एक मास्क आपको वायु प्रदूषण के खतरनाक प्रभावों से नहीं बचा पाएगा.
  • एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करते समय घर के सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दें.

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