NDTV-Dettol Banega Swasth Swachh India NDTV-Dettol Banega Swasth Swachh India
  • Home/
  • ताज़ातरीन ख़बरें/
  • दिल्ली से आगे निकला मुंबई का वायु प्रदूषण स्तर, क्या भारत इसे कम करने के लिए सूरत की ‘एमिशन ट्रेडिंग स्कीम’ को लागू कर सकता है?

ताज़ातरीन ख़बरें

दिल्ली से आगे निकला मुंबई का वायु प्रदूषण स्तर, क्या भारत इसे कम करने के लिए सूरत की ‘एमिशन ट्रेडिंग स्कीम’ को लागू कर सकता है?

भारतीय शहरों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर से बढ़ रहा है. IQAir की 2022 की सूची के अनुसार, स्विस एयर क्वालिटी टेक्नोलॉजी कंपनी, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई वायु प्रदूषण के उच्च स्तर वाले टॉप भारतीय शहर हैं

Read In English
दिल्ली से आगे निकला मुंबई का वायु प्रदूषण स्तर, क्या भारत इसे कम करने के लिए सूरत की ‘एमिशन ट्रेडिंग स्कीम’ को लागू कर सकता है?

नई दिल्ली: दिल्ली ज्य़ादातर वायु प्रदूषण से संबंधित सुर्खियों में छाई रहती है और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करने वाली वायु गुणवत्ता की बात आने पर यह बारहमासी ऑफेंडर के रूप में उभरती है. अगस्त 2022 में यूएस स्थित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट द्वारा जारी रिपोर्ट – एयर क्वालिटी एंड हेल्थ इन सिटीज के अनुसार, जब वायु गुणवत्ता की बात आती है, तो राष्ट्रीय राजधानी को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक माना जाता है, लेकिन वर्तमान में मुंबई की हवा की गुणवत्ता दिल्ली से भी ज्य़ादा खराब बताई जा रही है.

मुंबई ने दिल्ली की तुलना में खराब AQI दर्ज किया है. पिछले हफ्ते, दिल्ली का समग्र एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) स्तर 152 था, जिसे मध्यम स्तर पर माना जाता है, जबकि मुंबई 225 पर था, जो एयर क्वालिटी इंडेक्स वेबसाइट के अनुसार, ‘खराब’ श्रेणी में आता है.

इसे भी पढ़ें: दिल्ली की जहरीली हवा नई मांओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर क्‍या असर डाल रही है

भारतीय शहरों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर से बढ़ रहा है. IQAir की 2022 की सूची के अनुसार, एक स्विस एयर क्वालिटी टेक्नोलॉजी कंपनी, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई शीर्ष भारतीय शहर हैं जहां वायु प्रदूषण का उच्च स्तर देखा जा रहा है. लेकिन इसका समाधान क्या हो सकता है?

एनडीटीवी पर चर्चा के दौरान सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो विशेषज्ञ भार्गव कृष्णा, आवाज फाउंडेशन की पर्यावरणविद् और संयोजक सुमैरा अब्दुलाली, रेस्पिरेटर लिविंग साइंसेज के संस्थापक रौनक सुतारिया, ‘द ग्रेट स्मॉग ऑफ इंडिया’ के लेखक
सिद्धार्थ सिंह और शोधकर्ता माइकल ग्रीनस्टोन ने बढ़ते वायु प्रदूषण के खतरों और सूरत में लागू एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ईटीएस) जैसे संभावित समाधान के बारे में बात की. इसे ‘सूरत मॉडल’ के नाम से भी जाना जाता है.

मुंबई की वायु प्रदूषण की वर्तमान स्थिति के बारे में बात करते हुए, रौनक सुतारिया ने कहा,

मुंबई में पिछले सप्ताह प्रदूषण के स्तर में वृद्धि देखी गई है, और हम इसे लगभग 20 स्थानों पर ट्रैक कर रहे हैं; सरकार के पास लगभग 18 मॉनिटर हैं जो सप्ताह के दौरान काम कर रहे थे. हमने देखा कि पूरे दिन मौजूदा स्थान पर, वेल्यू लगातार हाई बनी रही, करीब 200 माइक्रोग्राम के आस पास. पूरे दिन इसका होना असामान्य है, क्योंकि आम तौर पर वायु प्रदूषण की स्थिति सुबह से शाम तक बदलती रहती है. लेकिन मुंबई में यह लगातार बना रहा, जो सामान्य नहीं है. फिलहाल यह बाहर से आने वाले प्रदूषण की ओर इशारा करता है. वहीं प्रदूषण नियंत्रण के कोई प्रयास उस पैमाने पर लागू नहीं किए गए थे जिस पैमाने पर उनकी आवश्यकता थी.

दूसरी ओर पर्यावरणविद् सुमैरा शेख ने मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण मिटिगेशन मेजर्स को तेजी से लागू करने के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि लोग एयर प्यूरीफायर और अन्य उपायों के साथ घरों के अंदर रहना पसंद करते हैं, लेकिन इसे समाधानों में से एक के रूप में नहीं गिना जा सकता है.

वायु प्रदूषण के प्रभाव से बचने के लिए हम एयर प्यूरीफायर वाले कमरे के अंदर नहीं रह सकते हैं. COVID-19 लॉकडाउन के बाद तक, मुंबई ने कभी भी इस स्थिति का सामना नहीं किया, इसलिए शहर में कुछ बदल गया है, और यह सिर्फ मौसम नहीं है क्योंकि कोई अधिक बदलाव नहीं हुआ है. मुंबई में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह स्पष्ट है कि इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन के अलावा, कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी में वृद्धि ने भी बढ़ते प्रदूषण के स्तर में योगदान दिया है. हम कंस्ट्रक्शन साइटों से बाहर निकलने वाली कंस्ट्रक्शन धूल, कंस्ट्रक्शन मलबे को ले जाने वाले खुले ट्रकों और बहुत कुछ देख सकते हैं. हम यह नहीं कह सकते कि बाहर से होने वाले इंडस्ट्री पॉल्यूशन का हमारी स्थिति से लेना-देना है.

इसे भी पढ़ें: “डॉक्टर इलाज कर सकते हैं, नीति निर्माताओं को वायु प्रदूषण से निपटने की जरूरत है”: डॉ. रचना कुचेरिया

सूरत की एमिशन ट्रेडिंग स्कीम- एक प्रदूषण समाधान?

एमिशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा शुरू की गई पार्टिकुलेट मैटर पॉल्यूशन के लिए एक पायलट एमिशन ट्रेडिंग स्कीम है और यह 2019 में सूरत में लागू की गई थी. यह दुनिया का पहला पार्टिकुलेट ट्रेडिंग सिस्टम है, और यह शिकागो विश्वविद्यालय में ऊर्जा नीति संस्थान द्वारा एक अध्ययन का हिस्सा है.

शिकागो विश्वविद्यालय के सूरत एमिशन ट्रेडिंग स्कीम के शोधकर्ताओं में से एक, माइकल ग्रीनस्टोन ने विस्तार से बताया कि ईटीएस कैसे काम करता है. ग्रीनस्टोन ने कहा कि सिस्टम उत्सर्जित होने वाले प्रदूषक की मात्रा पर एक लिमिट या कैप निर्धारित करता है. लिमिट या कैप उत्सर्जन परमिट के रूप में फर्मों को आवंटित या बेची जाती है, जो स्पेसिफाइड प्रदूषक की एक स्पेसिफिक मात्रा का उत्सर्जन या निर्वहन करने का काम करता है.

कंपनियों को अपने उत्सर्जन के बराबर कई परमिट या भत्ते रखने की आवश्यकता होती है. परमिट की कुल संख्या सीमा से अधिक नहीं हो सकती है, जिससे कुल उत्सर्जन उसी स्तर तक सीमित हो जाता है. उन्होंने आगे कहा कि जिन फर्मों को उत्सर्जन की मात्रा बढ़ाने की आवश्यकता है, उन्हें उन लोगों से परमिट खरीदना चाहिए जिन्हें कम परमिट की आवश्यकता होती है.

इस योजना ने पार्टिकल एमिशन को 29 प्रतिशत तक कम कर दिया और पार्टिकुलेट एमिशन को कम करने की लागत को कम कर दिया. इसके अलावा, इसने उद्योग के मुनाफे में वृद्धि की.

क्या उत्सर्जन व्यापार योजना (एमिशन ट्रेडिंग स्कीम) को अन्य भारतीय शहरों में दोहराया जा सकता है?

एमिशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) के बारे में बात करते हुए, भार्गव कृष्णा ने कहा कि यह एक पायलट प्रोजेक्ट था जिसे सीमित संख्या में उद्योगों के लिए लागू किया गया था, जैसे टेक्सटाइल्स. कृष्णा ने बताया कि कई राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या फ्रंटलाइन एनवायरमेंटल रेगुलेटर में कर्मचारियों की कमी है, बुनियादी तकनीकी ज्ञान की कमी है, और सूरत मॉडल के लिए धन और विशेषज्ञता प्रदान करने वाली किसी बाहरी संस्था की अनुपस्थिति में, इसे पूरे देश में लागू करना मुश्किल होगा. उन्होंने आगे कहा,

टेक्सटाइल सेक्टर को पारंपरिक रूप से अन्य उद्योगों की तुलना में प्रमुख प्रदूषकों में से एक नहीं माना जाता है. इस बात पर बहस की जा सकती है कि क्या इस तरह का काम (सूरत मॉडल) राजनीतिक रूप से विवादास्पद क्षेत्रों जैसे इस्पात, बिजली संयंत्रों आदि के लिए ट्रांसफरेबल है, जो टेक्सटाइल की तुलना में अधिक वायु प्रदूषण पैदा करते हैं. इसके पीछे का सिद्धांत अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बाजार-आधारित तंत्र अन्य भारतीय राज्यों में काम कर सकते हैं जिनमें क्षमता की काफी कमी है.

भारी उद्योगों की गैर मौजूदगी में बढ़ते प्रदूषण के स्तर वाले शहरों में एयर पॉल्यूशन मिटिगेशन के संदर्भ में, लेखक सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि पार्टिकुलेट मैटर के लिए ईटीएस की अवधारणा नई और फायदेमंद हो सकती है, स्टील जैसे बड़े उद्योगों का उपयोग एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम के दूसरे रूप – एनर्जी एफिशिएंसी ट्रेडिंग स्कीम के लिए किया जाता था. एनर्जी एफिशिएंट ट्रेडिंग स्कीम भारत सरकार की परफॉर्म, अचीव, ट्रेड (पीएटी) स्कीम के तहत आती है और यह कई सालों से चल रही है.

सिद्धार्थ सिंह ने कहा,

मुंबई के मामले में, पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण का लगभग 40 प्रतिशत गैर-मानवीय कारकों से आता है. इसलिए, अन्य 60 प्रतिशत को सीमा के भीतर नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन आखिरकार, हमें भारत के सभी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए थोड़ा और महत्वाकांक्षी तरीके से सोचना होगा और एक मिशन-मोड दृष्टिकोण अपनाना होगा.

उन्होंने कहा कि ईटीएस जैसी योजना को स्केल करने के लिए एक बुनियादी ढांचा मौजूद था, लेकिन चुनौती यह थी कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के पास देश में इस तरह के समाधानों को बढ़ाने की क्षमता नहीं है.

इसे भी पढ़ें: पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सत्यनारायण मैसूर से जानिए, दिल्ली की जहरीली हवा का हेल्‍थ पर क्‍या असर पड़ रहा हैं?

Highlights: Banega Swasth India Launches Season 10

Reckitt’s Commitment To A Better Future

India’s Unsung Heroes

Women’s Health

हिंदी में पढ़ें

This website follows the DNPA Code of Ethics

© Copyright NDTV Convergence Limited 2024. All rights reserved.