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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2022

International Women’s Day 2022: कैसे खबर लहरिया, महिलाओं के नेतृत्व वाला एक डिजिटल न्यूज़रूम, तोड़ रहा है लैंगिक पूर्वाग्रहों को

सभी महिलाओं के नेतृत्व वाला न्यूज़रूम और डिजिटल आउटलेट खबर लहरिया हाइपर-लोकल रिपोर्टिंग तैयार कर रहा है

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नई दिल्‍ली: छह बच्चों में सबसे बड़ी- चार बहनें और दो भाई, कविता देवी की शादी 12 साल की उम्र में कर दी गई थी. वह बचपन में कभी स्कूल नहीं गई थी. 1989 में, जब वह लगभग एक वयस्क थी, केंद्र सरकार ने अपने महिला साक्षरता कार्यक्रम के तहत बांदा, उत्तर प्रदेश में जहां कविता देवी रहती थीं, महिलाओं के लिए एक स्कूल शुरू किया . कविता ने उस स्कूल में अपना नामांकन कराया और पढ़ना-लिखना सीखा. जल्दी शादी करने से लेकर साक्षर होने तक और महिलाओं के नेतृत्व वाले डिजिटल न्यूजरूम ‘खबर लहरिया’ की प्रधान संपादक बनने तक, जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में काम कर रही है, कविता देवी की यात्रा चुनौतियों से भरी है. खबर लहरिया की निडर महिला पत्रिकाओं पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘राइटिंग विद फायर’ इस साल के ऑस्कर पुरस्कारों की दौड़ में है. इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, बनेगा स्वस्थ इंडिया की टीम ने बात की कविता देवी से, जो खबर लहरिया की सह-संस्थापक और खबर लहरिया की सीनियर रिपोर्टर नाज़नी रिज़वी से, जो हर दिन सिर्फ अपना काम करके लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ रही हैं.

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खबर लहरिया, जिसका अंग्रेजी में अर्थ है ‘News Waves’, 2002 में एक स्थानीय भाषा के समाचार पत्र के रूप में शुरू किया गया था, जिसे दिल्ली स्थित लिंग शिक्षा संगठन ‘निरंतर’ का समर्थन था. एनजीओ ने उत्तर प्रदेश में साक्षरता कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में सरकार की मदद की थी. खबर लहरिया कैसे शुरू हुआ, इस बारे में बात करते हुए, कविता देवी ने कहा,

एक बार सरकार का साक्षरता कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद, निरंतर ने महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें आवाज देने के उद्देश्य से ‘महिला डाकिया’ नामक एक चार पेज का ब्रॉडशीट अखबार शुरू किया. इसने न केवल स्थानीय भाषाओं में पठन सामग्री के निरंतर उत्पादन को सक्षम बनाया और सीखने के समग्र वातावरण को बढ़ावा दिया, बल्कि इसने लिंग और जाति की बाधाओं को भी तोड़ दिया. इस तरह मेरे साथ ही बांदा की कुछ महिलाओं ने प्रिंट पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश किया, जिस पर उस समय क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व था. मेरे पास पत्रकारिता में कोई डिग्री या औपचारिक शिक्षा नहीं है. महिला डाकिया को बंद कर दिया गया था और 2002 में, खबर लहरिया को ‘निरंतर’ और सात महिला कर्मचारि‍यों के सहयोग से लॉन्च किया गया, जिन्होंने बुंदेली और हिंदी भाषाओं में पाक्षिक समाचार पत्र के लिए लिखा, प्रोडक्‍शन किया और वितरण किया था. यह आठ पन्नों का साप्ताहिक स्थानीय समाचार पत्र था, जिसमें स्थानीय से लेकर वैश्विक समाचार तक सब कुछ शामिल था.

खबर लहरिया पूरी तरह से डिजिटल प्लेटफॉर्म कैसे बन गया, इस पर खबर लहरिया की प्रवक्ता सृष्टि ने कहा,

चूंकि अखबार कोई विज्ञापन नहीं ले रहा था, इसलिए उनके लिए टिकना मुश्किल हो रहा था और अधिक से अधिक लोग डिजिटल समाचारों का उपभोग करने लगे थे, इसलिए 2015 में खबर लहरिया पूरी तरह से डिजिटल प्लेटफॉर्म बन गया और दिल्ली के एक मीडिया संगठन चंबल मीडिया द्वारा लिए जाने के बाद यह एक ब्रांड बन गया. खबर लहरिया अभी भी कोई व्यावसायिक विज्ञापन नहीं ले रहा है. यह चंबल मीडिया पर निर्भर करता है, इंडिपेंडेंट एंड पब्लिक स्पिरिटेड मीडिया फाउंडेशन ( Independent and Public Spirited Media Foundation) से अनुदान और यूनिसेफ और अन्य संगठनों की परियोजनाओं से मदद लेता है, जिससे उन्हें डिजिटल पठन सामग्री, जागरूकता निर्माण परियोजनाओं और इस तरह के अन्य सहयोगों का उत्पादन करने में मदद मिलती है.

प्रवक्ता के अनुसार, एक डिजिटल समाचार आउटलेट के रूप में खबर लहरिया वर्तमान में 10 मिलियन से अधिक लोगों तक पहुंच रहा है. वर्तमान में, इसके 30 से अधिक पत्रकार हैं, जिनमें से लगभग 18 उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में, कुछ मध्य प्रदेश के 7 जिलों में और कुछ बिहार और छत्तीसगढ़ के 2-3 जिलों में कार्यरत हैं.

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पढ़ना और लिखना सीखने के माध्यम के रूप में जो शुरू हुआ, वह कविता देवी और अन्य लोगों के लिए एक जुनून और करियर पथ बन गया. कविता देवी के अनुसार, खबर लहरिया का उद्देश्य स्थानीय और स्वतंत्र सामग्री का निर्माण करना, स्थानीय मीडिया में नारीवादी आवाज लाना और महिलाओं को छोटे शहरों और गांवों में पत्रकारों के रूप में स्थापित करना था. उन्‍होंने कहा,

मेरे गांव में सभी का मानना ​​था कि मीडिया के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महिलाएं पत्रकार नहीं हो सकतीं. जब मैंने काम करना शुरू किया तो मेरे क्षेत्र में और यहां तक ​​कि पूरे उत्तर प्रदेश में कोई महिला पत्रकार नहीं थी. इस अंतर को पाटने और महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को तोड़ने के उद्देश्य से, जब खबर लहरिया शुरू हुई, तो हमने फैसला किया कि हम अधिक से अधिक महिलाओं को पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षित करेंगे और लाएंगे. हम गांवों से महिलाओं और लड़कियों को भर्ती करते हैं, जो पढ़ना-लिखना जानती हैं और यहां तक ​​कि जो पढ़ना-लिखना नहीं जानती हैं. हमारा मुख्य उद्देश्य क्षेत्र से अति-स्थानीय खबरों को लाना है. और भर्ती करते समय, साक्षात्कार के दौरान हम उम्मीदवारों से अपने गांव से एक कहानी के बारे में बात करने या कुछ भूमिका निभाने के लिए कहते हैं और हमारा अनुभव यह रहा है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक महिला ने किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा ली है. स्‍टोरी करने का जुनून और उसकी तह तक जाने का दृढ़ संकल्प वास्तव में मायने रखता है.

अधिक ग्रामीण महिलाओं को रिपोर्टर बनने के लिए प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से खबर लहरिया इस साल अप्रैल में चंबल अकादमी शुरू कर रहे हैं. कविता देवी ने जोर देकर कहा कि संगठन अधिक स्थानीय महिलाओं और वंचित समुदायों के लोगों की भर्ती की दिशा में काम कर रहा है.

कविता देवी ने कहा कि महिलाओं के मुद्दों और महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और घरेलू हिंसा से जुड़ी कहानियों को उजागर करने के साथ-साथ खबर लहरिया में वन अधिकार, भूमि, नदी, पानी, राजनीति, सांप्रदायिकता, अपराध, दुर्घटनाएं, पर्यावरण संबंधी मुद्दों को भी शामिल किया गया है. वे कहती हैं-

हम कुछ नहीं छोड़ते. हम अधिक से अधिक चीजों को कवर करते हैं और हम इसे दूसरों की तुलना में बेहतर करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि हम स्थानीय लोगों के दृष्टिकोण और नारीवादी लेंस को अपने समाचार कवरेज में लाते हैं.

ग्रामीण भारत में महिला पत्रकारों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में एनडीटीवी से बात करते हुए, वरिष्ठ रिपोर्टर नाज़नी रिज़वी, जो पिछले 13 वर्षों से ख़बर लहरिया के लिए स्थानीय राजनीति, अपराध, दुर्घटनाओं और डकैतों पर रिपोर्टिंग कर रही हैं, ने कहा,

मैं तीन लड़कियों और दो लड़कों की मां हूं और उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक छोटे से गांव पापरेंडा की रहने वाली हूं. मैं दुर्घटनावश पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गई. मैं नौकरी की तलाश में थी और खबर लहरिया के बारे में पता चला. मेरा परिवार और मेरे गांव के लोग इसके खिलाफ थे. रिपोर्टर की नौकरी करना, बाहर जाना, लोगों से बात करना, इंटरव्यू लेना, जोखिम उठाना ये सब कुछ ऐसा माना जाता था जो केवल पुरुषों को ही करना चाहिए. उन्होंने मुझे बेशर्म कहा. आज भी, वे एक रिपोर्टर होने के नाते मेरा समर्थन नहीं करते हैं. जब हम इंटरव्यू लेने के लिए बाहर जाते हैं, तो बहुत समय, खासकर शुरुआती दिनों में, लोगों ने हमें गंभीरता से नहीं लिया. हमें सवाल पूछने और अपनी स्‍टोरिज को प्राप्त करने के लिए बोल्ड होना पड़ा.

रिज़वी को कई दर्शक उनके शो ‘बोलेंगे बुलवायेंगे, हंस के सब कह जाएंगे’ के माध्यम से भी जानते हैं, जहां वह सामाजिक समस्याओं और नारीवादी मुद्दों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करती हैं. रिज़वी, जो स्थानीय मीडिया पेशेवरों के ऑनलाइन समूहों का प्रबंधन करती हैं और इन समूहों पर लिंग, जाति और सांप्रदायिकता पर चर्चा को मॉडरेट करती हैं, ने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी, खबर लहरिया पत्रकार मैदान पर थे, जो लोगों के कठिन समय के बारे में रिपोर्ट कर रहे थे. लॉकडाउन के कारण गांव के लोगों पर जो गुजर रही थी उसकी रिपार्ट कर रहे थे. उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान खबर लहरिया ने जरूरतमंद लोगों को उपलब्ध समर्थन से जोड़ने के लिए कई पहल की हैं.

कवित देवी के अनुसार, जबकि देश में अभी भी एक डिजिटल विभाजन है, लोग तेजी से ऑनलाइन समाचार उपभोग की ओर बढ़ रहे हैं. –

कोविड के दौरान, हमें महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से फोन आए जहां हम काम नहीं कर रहे हैं. इससे हमें एहसास हुआ कि खबर लहरिया ने एक विशाल पहुंच बना ली है. देश भर की महिलाएं हमारे कार्यक्रम देखती हैं. हो सकता है कि उसके पास मोबाइल फोन न हो, लेकिन वह अपने बेटे/बेटी के मोबाइल फोन के जरिए हमसे जुड़ी हुई है.’

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