Connect with us

ताज़ातरीन ख़बरें

प्लास्टिक पॉल्यूशन के खिलाफ लड़ाई है 18 वर्षीय क्लाइमेट वॉरियर आदित्य मुखर्जी का मिशन

आदित्य ने टीम बनेगा स्वस्थ इंडिया से बात की और अपनी लेटेस्ट इनिशिएटिव और यूएन यंग क्लाइमेट लीडर के रूप में उनकी जर्नी पर चर्चा की.

Read In English
Fight Against Plastic Pollution Is The Mission Of 18-year-old Climate Warrior Aditya Mukarji
हमें वनों की कटाई रोकने और इन्‍हें बढ़ाने की आवश्यकता है: आदित्य मुखर्जी

नई दिल्ली: युवा एनवायरमेंटलिस्ट और संयुक्त राष्ट्र भारत अभियान के लिए 17 यंग क्लाइमेट लीडर्स में से एक आदित्य मुखर्जी कहते हैं, “मैं इंतजार करते हुए और देख नहीं सकता था. मैं कुछ अलग करने में मदद करने के लिए अपनी ओर से कुछ करना चाहता था. मैं चाहता हूं कि हम सभी अपनी डेली लाइफ में, अपने एनवायरमेंट पर पॉजिटिव इम्पैक्ट लाने में मदद करने के लिए अपना योगदान दें, ‘वी द चेंज’ एक रेगुलर टीनेजर के विपरीत, आदित्य ने 13 साल की उम्र में दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण मुद्दे से निपटने के बड़े कारण को अपनाया. जब वह गुड़गांव के श्री राम स्कूल अरावली में क्लास 9 में थे, उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस 2018 तक 50,000 प्लास्टिक स्ट्रॉ को इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ से बदलने की चुनौती अपने हाथ में ली थी. उन्होंने दिल्ली स्थित एनजीओ चिंतन के साथ उनके सबसे कम उम्र के इंटर्न के रूप में भी काम करना शुरू कर दिया. अपने अथक प्रयासों से वह डेडलाइन से पहले अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहे. आज, चार साल बाद, उन्होंने प्लास्टिक पॉल्यूशन और वेस्ट मैनेजमेंट के मुद्दे से निबटने के प्रयासों को जारी रखा है, आदित्य ने टीम बनेगा स्वस्थ इंडिया से बात की और अपनी लेटेस्ट इनिशिएटिव और यूएन यंग क्लाइमेट लीडर के रूप में उनकी जर्नी पर चर्चा की.

NDTV: 13 साल की उम्र में आपने प्लास्टिक के स्ट्रॉ को इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ से बदल कर लड़ाई शुरू कर दी थी. आपने लगभग 26 मिलियन प्लास्टिक स्ट्रॉ और कुछ मिलियन सिंगल-यूज प्लास्टिक को हटाने में मदद की है. हमें अपनी पहल के बारे में बताएं और यह सब कैसे शुरू हुआ?

आदित्य मुखर्जी: यह 2018 में बहुत ही सिंपल तरीके से शुरू हुआ, जब मैं 14 साल का था, मैंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक बहुत ही परेशान करने वाला वीडियो देखा, एक डॉक्टर कछुए की नाक से प्लास्टिक स्ट्रॉ निकालने की कोशिश कर रहा था. कछुए के रोने और खून बहने ने मुझे वास्तव में प्रभावित किया और मुझे ह्यूमन एक्शन के लिए गिल्टी महसूस कराया, जिसे हम अन्य लिविंग फॉर्मस के परिणामों के बारे में सोचे बिना लेते हैं. मैंने प्लास्टिक पॉल्यूशन और वेस्ट डिस्पोजल की समस्याओं के बारे में पढ़ना शुरू किया और तभी मुझे एहसास हुआ कि यह एक बड़ी समस्या है. ओसियन और लैंडमासेस प्लास्टिक से पूरी तरह भर गई है और प्लास्टिक कभी बायोडिग्रेड नहीं होता. मैंने अपने मेनटॉर, चिंतन के भारती चतुर्वेदी से बात की, जिन्होंने मुझे वेस्ट मैनेजमेंट और कचरा बीनने वालों की समस्याओं के बारे में बताया. तभी मेरे मन में प्लास्टिक पॉल्यूशन की समस्या से निपटने का विचार आया, यानी मैंने हॉस्पिटैलिटी उद्योग में इसके स्रोत पर सिंगल

यूज प्लास्टिक का उन्मूलन करने के बारे में सोचा. उन्होंने वास्तव में मेरे आइडिया और एफर्ट्स का समर्थन किया, जो बहुत ही सिंपल थे, एक स्ट्रॉ की पेशकश बिल्कुल नहीं करना. और अगर कस्टमर इसकी डिमांड करते हैं, तो उन्हें इको-फ्रेंडली अल्टरनेटिव दें. यह एक सिंपल अप्रोच के साथ आया – मैंने प्रॉब्लम पर प्रकाश डाला, मैंने उन्हें सॉल्यूशन दिया, और उन्हें बताया कि यह उनके लिए कैसे फायदेमंद है. मेरी राय में कोई भी कार्य या मूवमेंट सभी की जरूरतों और चाहतों के संबंध में होना चाहिए.

NDTV: 18 साल की उम्र में, आप यूएन इंडिया कैंपेन, ‘वी द चेंज’ के लिए 17 यंग क्लाइमेट लीडर्स में से एक हैं. यह जिम्मेदारी कितनी बड़ी है और भारत में क्लामेट एक्शन मूवमेंट को चलाने के लिए आपकी क्या प्लानिंग है?

आदित्य मुखर्जी: यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने हमें यूथ क्लाइमेट एक्शन का चेहरा बनाया है और हमें भारत में कार्रवाई को बढ़ावा देने के साथ-साथ अन्य युवाओं को क्लाइमेट एक्शन करने के लिए प्रेरित करने का काम सौंपा है. मैं व्यक्तिगत रूप से यूथ इंगेजमेंट और जमीनी स्तर पर क्लाइमेट एक्शन को बढ़ावा देने में लगा हुआ हूं. मेरी राय में, कोई भी सोशल मूवमेंट या क्लाइमेट एक्शन मूवमेंट वास्तव में तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि समाज के जमीनी स्तर पर परिवर्तन शुरू नहीं किया जाता है. और यहीं पर मैं लोगों की सोच को बदलना चाहता हूं, उन्हें एनवायरनमेंट फ्रेंडली बनाना चाहता हूं और सिंपल और स्मॉल स्टेप्स उठाकर उन्हें उनकी जड़ों और विरासत से जोड़ना चाहता हूं. मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि क्लाइमेट एक्शन मूवमेंट केवल आंकड़ों से नहीं बल्कि आंकड़ों की गुणवत्ता और जमीनी स्तर पर लाए गए बदलाव से होता है.

NDTV: जुलाई 2020 में आपने ‘फॉरेस्ट ऑफ होप’ अभियान शुरू किया था. इसमें दुनिया के 195 देशों के बच्चों के लिए 195 प्रजातियों के फल देने वाले वृक्ष लगाने की पहल की गई थी. यह अर्बन फॉरेस्ट्री के लिए एक पहल थी. हमें इस पहल के बारे में बताएं और इसकी चुनौतियों को देखते हुए इस बात को लेकर चिंताएं हैं कि लगाए गए पेड़ों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए ये वृक्षारोपण अभियान कितने सफल हैं.

आदित्य मुखर्जी: यह एक ग्लोबल प्रोजेक्ट है -फॉरेस्ट ऑफ़ होप – जिसमें हर देश के बच्चों और युवाओं के लिए एक पेड़ उगाने के प्रयास शामिल हैं, इसलिए 195 पेड़ उगाने का मुख्य उद्देश्य देशी और फल देने वाले पेड़ उगाना है क्योंकि वे बढ़ने और पोषण करने में सबसे आसान हैं. ट्री प्लांटेशन कैंपेन केवल पेड़ लगाने के लिए नहीं है बल्कि वे तभी बढ़कर विकसित होंगे, जब उनकी देखभाल की जाए. इसके लिए, मैंने भारत के भीतर और बाहर विभिन्न संस्थानों के साथ भागीदारी की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कम से कम 3 साल तक उनकी देखभाल की जाए ताकि उन्हें सर्वाइवल करने का मौका मिल सके और यदि पौधे मर जाते हैं, तो उस जगह नए पौधे लगाए जाएं. हम 45 से अधिक ऐसे वन लगा चुके हैं जिसमें करीब 9000 पेड़ हैं. इसका उद्देश्य यह था कि चूंकि दुनिया कार्बन फुटप्रिंट्स को कम करने के लिए दौड़ रही है, हमें इंडिविजुअल और ऑर्गेनाइजेशन के रूप में भी अपनी लाइफस्टाइल और लोकल एनवायरनमेंट में बदलाव लाने की जरूरत है और यह आर्थिक विकास के शुद्ध उद्देश्य के लिए अर्बन फॉरेस्ट्री की एक सिंपल चीज के माध्यम से किया जाता है. यह प्रोग्राम आजकल के बच्चों को बेहतर कल का संदेश देने का एक इंडिपेंडेंट एफर्ट है. जब आप देसी प्रजातियों के पेड़ पौधों को वापस लाएंगे तभी आप आसानी से सरवाइव कर पाएंगे.

NDTV: उत्सर्जन और पॉल्यूशन के मामले में हम जिस तरह की समस्याओं से निपट रहे हैं, उसमें ट्री प्लांटेशन कितना प्रभावी है?

आदित्य मुखर्जी : वृक्षों का पालन-पोषण और देसी प्रजातियों के रोपण जैसी बहुत कम परिस्थितियों में वनरोपण एक प्रभावी उपाय हो सकता है और यह वनों की कटाई और पेड़ों की कटाई के बाद नहीं किया जा सकता है. यहां तक कि 100 पौधे भी कार्बन उत्सर्जन को कम करने के मामले में एक परिपक्व पेड़ नहीं बन सकते हैं. हमें वनों की कटाई रोकने की जरूरत है और वनों को बढ़ाने की एक साथ आवश्यकता है. नगर निगम और स्थानीय निकाय इन वृक्षारोपण और पोषण गतिविधियों को आसानी से कर सकते हैं क्योंकि उनके पास ऐसा करने के लिए संसाधन हैं, और वे लोगों में जागरूकता फैलाने में भी मदद कर सकते हैं. भले ही लोग अपने घर के बगीचे में एक या दो पौधे लगाते हैं, फिर भी यह कहीं न कहीं एक बड़ा बदलाव लाता है.

NDTV: आप इंडिविजुअल सोशल रिस्पांसिबिलिटी में विश्वास करते हैं, और आप यह भी कहते हैं कि “यदि आप पुन: उपयोग नहीं कर सकते तो मना कर दें, दुनिया को जितना आपने पाया है उससे थोड़ा बेहतर छोड़ने के लिए”. इस गोल पर टिके रहने के लिए आप अपनी डेली लाइफ में किस तरह के कदम उठाते हैं?

आदित्य मुखर्जी: मैं बहुत ही सिंपल और स्मॉल स्टेप्स उठाता हूं जैसे कि मैं सिंगल-यूज प्लास्टिक का यूज नहीं करता हूं, जब मैं बाहर जाता हूं तो मैं अपनी पानी की बोतल ले जाता हूं, अगर मैं कॉफी शॉप में जाता हूं तो अपने साथ एक मेटल स्ट्रॉ ले जाता हूं. अगर मैं स्टारबक्स या सीसीडी जा रहा हूं, तो मैं या तो उनके सिरेमिक मग का यूज करता हूं या उनके प्लास्टिक कप से बचने के लिए अपने खुद के ट्रैवल मग का यूज करता हूं. अगर मैं ग्रोसरी शॉपिंग करने जा रहा हूं, तो मैं हमेशा अपना जूट बैग लेता हूं, भले ही मुझे दुकान पर इको-फ्रेंडली बैग मिल जाए, मैं इसे मना कर देता हूं क्योंकि यह बाद में मेरे लिए उपयोगी नहीं होते. जब मैं स्कूल जाता था तो मैं स्टील के टिफिन और पानी की बोतलें ले जाता था, मैं बांस के टूथब्रश और शैम्पू बार का यूज करता था, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी और जहां भी संभव हो मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करता हूं. दूसरी बात यह है कि कचरे को सात कैटेगरी में बांटा गया है- वेट, ड्राई, पेपर, मेटल, प्लास्टिक, ई-वेस्ट और मेडिकल वेस्ट. हम कॉलोनी में गीले कचरे से खाद बनाते हैं और अपने प्लास्टिक कचरे को एक प्रोपर वेंडर को देते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह वास्तव में रिसाइकल्ड है. भले ही रीसाइक्लिंग सबसे अच्छा तरीका नहीं है, यह लैंडफिल में समाप्त होने से बेहतर है.

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Folk Music For A Swasth India

RajasthanDay” src=

Reckitt’s Commitment To A Better Future

Expert Blog

हिंदी में पड़े

Latest Posts