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गाजीपुर लैंडफिल में फिर लगी आग : क्या गाजीपुर डंप साइट में पुराने कचरे को साफ करने की कोशिशें हो रहीं हैं बेकार?

सोमवार (12 जून) की दोपहर में दिल्ली के गाजीपुर डंप साइट में मीथेन गैस पैदा होने और उच्च तापमान के चलते आग लग गई

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Ghazipur Landfill Catches Fire, Again: Are Efforts To Clear Legacy Waste At Ghazipur Dumpsite Failing?
ग़ाज़ीपुर कूड़ा स्थल दिल्ली के तीन कूड़ा स्थलों में से एक है [प्रतीकात्मक छवि]

नई दिल्ली: दिल्ली के गाजीपुर लैंडफिल में कचरे के तीन पहाड़ों में से एक में सोमवार (12 जून) दोपहर आग लग गई. दिल्ली नगर निगम (MCD) के मुताबिक आग लगने का कारण मीथेन गैस का बनना और उच्च तापमान था. ये लैंडफिल, जो तकनीकी तौर पर डंप साइट है. यहां हर तरह का कचरा होता है – गीला, सूखा, बायोमेडिकल, सैनिटरी और यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक कचरा. बायोडिग्रेडेबल या गीला कचरा समय के साथ डीकम्पोज हो जाता है, कार्बनिक कचरे के anaerobic decomposition (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्बनिक कचरे का टूटना) से मीथेन गैस पैदा होती है, जो ज्वलनशील होती है और हीट जनरेट करती है. यही वजह है कि दिल्ली में कूड़े के ढेर, खासकर गर्मियों में, अक्सर आग पकड़ लेते हैं. अगर आग नहीं भी लगती, तो ये हमेशा हिस्सों में सुलगते नजर आते हैं.

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PTI के मुताबिक दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने एक बयान में कहा,

शाम तक करीब 60-70 फीसदी आग पर काबू पा लिया गया था. इसे और फैलने नहीं दिया गया.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की MSW (म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट) टीम की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर डॉ. ऋचा सिंह ने लैंडफिल में आग लगने से सेहत को होने वाले खतरों के बारे में टीम बनेगा स्वस्थ इंडिया से बात करते हुए कहा,

मिक्स्ड वेस्ट (डंप साइटों पर) आग लगने पर डाइऑक्सिन और फ्यूरान टॉक्सिक केमिकल छोड़ती है जो स्वभाव से कार्सिनोजेनिक होते हैं. मीथेन और H2S (हाइड्रोजन सल्फाइड) जैसी अन्य हानिकारक गैसें भी पैदा होती हैं, साथ ही पार्टिकुलेट मैटर और अमोनिया का हाई लेवल भी होता है.

टिक-टिक करता टाइम बम सबित हो सकती है गाजीपुर डंप साइट

यह पहली बार नहीं है जब गाजीपुर डंप साइट में आग लगी है. दिल्ली फायर सर्विस से मिले डेटा के मुताबिक, 2019 और 2022 के बीच, डिपार्टमेंट को गाजीपुर डंप साइट से आग लगने के 23 कॉल आए थे.

पिछले साल 28 मार्च को गाजीपुर इलाके में डंप साइट पर भीषण आग लग गई थी. हालांकि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन इससे दिल्ली के प्रदूषण स्तर में भारी वृद्धि हुई. इस आग को बुझाने में 50 घंटे लगे और लगभग 100 फायर फाइटर की जरूरत पड़ी थी.

इसके बाद एक महीने से भी कम समय में ऐसी दो और घटनाएं दर्ज की गई, जिसने राजधानी की पहले से ही जहरीली हवा को और प्रदूषित कर दिया.

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दिल्ली के डंप साइट में एक के बाद एक आग लगने की घटनाओं ने प्रधानमंत्री को बढ़ते तापमान के बारे में राज्य सरकारों को चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया. भारत की राज्य सरकारों के प्रमुखों के साथ ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस में पीएम मोदी ने कहा, ‘देश में तापमान तेजी से बढ़ रहा है.’

उन्होंने आगे कहा,

इसकी वजह से हम पिछले कुछ दिनों में कई जगहों – जंगलों, इमारतों और अस्पतालों में – आग लगने की बढ़ती घटनाओं को देख रहे हैं.

गाजीपुर डंप साइट – एक खतरनाक साइट

गाजीपुर डंप साइट राजधानी दिल्ली की तीन डंप साइट्स में से एक है. बाकी दो ओखला और भलस्वा डंप साइट हैं. गाजीपुर दिल्ली की सबसे पुरानी डंप साइट है जिसे 19984 में शुरू किया था और ये 72 एकड़ में फैली हुई है. ये डंप साइट 2002 में ही 20 मीटर की permissible height को पार कर गई थी. यह तब यहां कचरा बढ़ता जा रहा है और एमसीडी के मुताबिक आज इसकी ऊंचाई लगभग 40 मीटर है. एमसीडी से मिले आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2019 तक तीन डंप साइट पर 280 लाख टन कचरा डाला गया है, जिसमें अकेले गाजीपुर साइट पर 140 लाख टन डाला गया है.

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 को ध्यान में रखते हुए, एमसीडी ने लिगेसी वेस्ट के बायो-माइनिंग का विकल्प चुना. 3 नवंबर, 2022 को, एमसीडी ने तीन कंपनियों को 18 महीने यानी मई 2024 तक तीन साइटों में से प्रत्येक पर 30 लाख टन पुराने कचरे को प्रोसेस करने और डिस्पोज करने का जिम्मा दिया. जब यह टारगेट पूरा हो जाएगा, तो एडिशनल 15 लाख मीट्रिक टन के लिए कॉन्ट्रैक्ट को रिन्यू किया जाएगा.

गाजीपुर डंप साइट पर पुराने कचरे को मैनेज करने का जिम्मा सुधाकर इंफ्राटेक, ओखला साइट के लिए ग्रीनटेक एनवायरन मैनेजमेंट और भलस्वा के लिए अल्फा थर्म लिमिटेड को गार्बेज मैनेजमेंट की जिम्मेदारी सौंपी गई है. तीनों कंपनियों ने इसके लिए ट्रॉमेलिंग (tromelling) को अपनाया है – ट्रॉमेल मशीनों के माध्यम से कचरे को छानने और इसे तीन कैटेगरी में अलग करने की प्रक्रिया है.

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गाजीपुर में 2019 से 140 लाख टन में से 16.46 लाख टन पुराने कचरे का बायो-माइनिंग किया गया है. दिल्ली सरकार ने दिसंबर 2024 तक साइट को साफ करने का लक्ष्य रखा है. राज्य सरकार का दो साल में कचरे के तीन पहाड़ों को हटाने का लक्ष्य है और साइट को समतल करने के लिए वह 850 करोड़ रुपये ऑफर कर रही है.

डॉ. सिंह के विश्लेषण के मुताबिक, पुराने कचरे को दूर करने के लिए दिल्ली को पांच से छह साल की जरूरत होगी. डॉ. सिंह ने कहा,

दिल्ली के डंप साइट पर ट्रॉमेल्स की cumulative installed capacity प्रतिदिन 22,000 टन है. यदि हम मानते हैं कि एक साल में लगभग 245 दिन काम होगा (मानसून के तीन महीनों को छोड़कर), तो 280 लाख टन पुराने कचरे (जुलाई 2019 तक डंप किए गए) को दिल्ली की तीनों साइटों से साफ करने के लिए पांच से छह साल लगेंगे, वो भी तब जब वहां कोई ताजा कचरा नहीं डाला जा रहा है.

एक तरफ पुराने कचरे की मात्रा को कम करने और कचरे के मानव निर्मित पहाड़ की ऊंचाई को कम करने के प्रयास जारी हैं और दूसरी तरफ ताजा कचरा नियमित तौर पर इन साइट पर डंप किया जाता है. हालांकि गाजीपुर में आने वाला फ्रेश म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (MSW) 2,000-2,200 TPD से घटकर लगभग 1,500 टन प्रति दिन (TPD) हो गया है.

गाजीपुर डंप साइट की समस्या को दूर करने के लिए एक के बाद एक प्लान

न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने पिछले साल लैंडफिल साइटों पर आग की घटनाओं को रोकने के लिए नौ सूत्री कार्य योजना (nine-point action plan) शुरू की थी. इस योजना में डंप साइटों के चारों ओर एक सड़क का निर्माण किया जाना था, जिससे वहां तक गाड़ियों की आवाजाही और पेट्रोलिंग टीमों को जाने में आसानी हो. डंप साइट में अनऑथराइज्ड एंट्री को रोकने के लिए कांटेदार तार की बाड़ के साथ चार मीटर ऊंची चारदीवारी का निर्माण करना शामिल था.

इस योजना के तहत, एमसीडी को कचरा बीनने वालों के अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए लैंडफिल साइटों पर फेंके जा रहे कचरे को अलग करने के लिए एक एजेंसी को शामिल करने का निर्देश दिया गया है.

ज्यादा ज्वलनशील गैसों को पैदा होने से रोकने के लिए परफोरेटेड हाई डेंसिटी वाले पॉलीथीन पाइप इंस्टॉल किए जाएंगे और डंपिंग साइटों की एक्टिविटी पर एक डेडिकेटेड सर्विलांस टीम नजर रखेगी.

हालांकि इन उपायों से कितना फर्क पड़ेगा ये जानने के लिए फिलहाल इंतजार करना होगा.

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