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कोई पीछे नहीं रहेगा

प्राइड मंथ स्‍पेशल: अच्‍छी सेहत और मानसिक स्थिति के साथ-साथ मनोचिकित्सक निभाते हैं ट्रांसजेंडरों की सर्जरी में अहम भूमिका

गंगाराम अस्पताल के मनोचिकित्सक विभाग के वरिष्ठ सलाहकार व उपाध्यक्ष डॉ. राजीव मेहता बताते हैं LGBTQIA+ व्‍यक्तियों की लिंग परिवर्तन सर्जरी में साइकेट्रिस्ट भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

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अच्‍छी सेहत और मानसिक स्थिति के साथ-साथ मनोचिकित्सक निभाते हैं ट्रांसजेंडरों की सर्जरी में अहम भूमिका
एक क्वीर व्यक्ति के जीवन में मनोचिकित्सक की भूमिका और वह उन्हें वांछित स्वास्थ्य देखभाल उपचार प्रदान करने में कैसे मदद करते हैं

नई दिल्ली: अपने सही लिंग की पहचान करने का LGBTQIA+ व्यक्तियों का भीतरी संघर्ष अक्सर कई-कई साल तक चलता रहता है और इससे उन्हें भारी मानसिक आघात भी लगता है. अपने इस आत्म-बोध को परिवार, समाज या बाहरी दुनिया के सामने प्रकट करना भी उनके लिए काफी तनाव भरा होता है. इस बेहद निजी चीज के सार्वजनिक होने से जुड़ी अनिश्चितता एक लचीले व्यक्ति की भी मानसिक व भावनात्मक ताकत की कड़ी परीक्षा ले लेती है. LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के लिए यह संघर्ष एक कड़वी हकीकत है और अक्सर वह इससे तब ही बच पाते हैं, जबकि वह अपनी असली पहचान को छुपा कर न रखें, जोकि और भी अधिक दर्दनाक होता है. इसके अलावा LGBTQIA+ समुदाय के कई लोगों को वर्षों तक दुर्व्यवहार, अपमान, उपेक्षा, अस्वीकृति, भेदभाव और अकेलेपन के बोझ को भी सहना पड़ता है.

मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली पर ध्यान देने की आवश्यकता इस समुदाय के लोगों के लिए काफी मायने रखती है। इसके बावजूद अकसर इस बात को इनके उपचार के दौरान नज़रअंदाज कर दिया जाता है कि जेंडर अफरमेशन सर्जरी के जरिये अपना लिंग बदलने जैसे जिंदगी को बदल कर रख देने वाले कदम में इन्‍हें एक मनोचिकित्सक की सहायता की भी जरूरत होती है.

हमारे प्राइड मंथ स्‍पेशल के तहत ‘टीम बनेगा स्वस्थ इंडिया’ ने नई दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के मनोचिकित्सक विभाग के उपाध्यक्ष, वरिष्ठ सलाहकार, डॉ. राजीव मेहता से इस बारे में लंबी बातचीत की, ताकि LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के जीवन में मनोचिकित्सक की भूमिका को समझा जा सके और उन्हें एक उचित स्वास्थ्य देखभाल मुहैया कराई जा सके। हमारी चर्चा कुछ इस प्रकार रही:

जेंडर डिस्फोरिया को समझना

सबसे पहले डॉ. राजीव मेहता ने जेंडर डिस्फोरिया शब्द के बारे में बताते हुए कहा,

कभी-कभी जब एक जैविक पुरुष (बायोलॉजिकल मेल) खुद को महिला के रूप में पहचानता है ( मामला इससे उल्‍टा भी हो सकता है) तो जन्म के समय निर्धारित अपने जेंडर के साथ जीना उसके लिए परेशानी भरा हो जाता है., क्योंकि यह उस व्यक्ति की अस‍ली पहचान से मेल नहीं खाता है, तो इसे जेंडर डिस्फोरिया कहा जाता है. जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित लोगों को अक्सर लगता है कि उनका जन्म गलत लिंग में हुआ है। परिणामस्वरूप, इस भावना को ठीक करने के लिए, लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी यानी जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी , जिसे कभी-कभी सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी भी कहा जाता है. यह सर्जरी जेंडर डिस्फोरिया वाले व्यक्तियों को उनके मनचाहे लिंग में परिवर्तित करने के लिए की जाती है.

हर LGBTQIA+ जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी नहीं करा सकता

इस बात पर प्रकाश डालते हुए कि डॉक्टर किसी व्यक्ति को कैसे जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी के योग्य बनाते हैं, डॉ. मेहता ने कहा,

जब मरीज पहली बार हमारे पास आता है, तो सबसे पहले हमें यह देखना होता है कि क्या वह वास्तव में जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित है या वे किसी अन्य उद्देश्य से ऐसा कर रहा है. कई बार हमने देखा है, जब माता-पिता के पास लड़का नहीं होता, तो वे चाहते हैं कि उनकी लड़कियां लड़का बन जाएं. इसलिए, जब कोई असामान्‍य लिंग वाला व्यक्ति इलाज के लिए हमारे पास आता है, तो हमें सभी आशंकाओं को खत्‍म करना होता है.

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डॉ. मेहता ने कुछ उपाय बताए, जो मनोचिकित्सक आमतौर पर जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित व्यक्ति की पहचान करने के लिए अपनाते हैं। उन्होंने कहा,

– हम बचपन से लेकर उनकी यात्रा पर नज़र रखते हैं
– हम उनके व्यवहार, सामाजिक आचरण, पहनावे को देखते-परखते हैं
– हम देखते हैं कि जब वे हमार पास आते हैं तो शुरू-शुरू में अपने लिए किन सर्वनामों का इस्‍तेमाल करते हैं.
– आमतौर पर हम उनसे अपने नज़रिये को समझने के लिए उनकी स्थानीय भाषा या हिंदी में हमसे बात करने को कहते हैं, क्योंकि अंग्रेजी में आमतौर पर सर्वनामों का उपयोग नहीं किया जाता है.
– फिर, हम किसी ऐसे व्यक्ति से उनके अतीत की पुष्टि करने की कोशिश करते हैं, जो उनके साथ बचपन से या कम से कम पिछले 6 महीनों से रह रहा हो.
– हम उनसे अपनी पुरानी तस्वीरें दिखाने के लिए भी कहते हैं, ताकि हम शरीर के साथ उनके अलगाव को समझ सकें आमतौर पर ये तस्वीरें निर्णायक साबित होती हैं, क्योंकि यह उस व्यक्ति की पहचान को भली भांति दर्शाती हैं.

डॉ. मेहता ने आगे कहा कि एक बार जब ऐसे व्यक्ति की पहचान हो जाती है जो जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित है और जिसे वास्तव में इलाज की जरूरत है, तो मनोचिकित्सक आमतौर पर उसके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्‍याओं को समझने की कोशिश करते हैं, जिनसे वह जूझ रहा होता है. डॉ मेहता ने कहा,

इन लोगों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की एक पूरी श्रृंखला होती है, जिसमें डिप्रेशन से लेकर चिंता, नशीली दवाओं की लत तक शामिल होती है. इससे पहले कि हम इनकी सर्जरी कीमंजूरी दें, हमें यह सुनिश्चित करना होता है कि इनकी सारी मानसिक समस्याएं ठीक हो जाएं.

डॉ. मेहता ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया में डॉक्टरों को उस व्‍यक्ति में ऐसी कोई अन्‍य बीमारी होने की आशंका को भी खत्‍म करना होता है, जिसमें व्यक्ति सोचता है कि वह दूसरे लिंग का है. साइकोफोबिया साइकोसिस इसका एक उदाहरण है. डॉ. मेहता ने कहा कि इस सबके लिए डॉक्टरों को अपनी संज्ञानात्मक (कॉग्‍नेटिव), वित्तीय क्षमताओं को भी देखना होगा और सोशल सपोर्ट सिस्‍टम और व्यवसाय को भी समझना होगा.

डॉ. मेहता ने हमारे साथ एक उदाहरण साझा करते हुए कहा,

मुझे याद है, मेरे सहकर्मी के पास एक मामला आया था, जिसमें एक गायिका खुद को एक पुरुष के रूप में परिवर्तित कराना चाहता थी. इसलिए, जब उसने इलाज शुरू किया और हार्मोन थेरेपी लेनी शुरू की, तो वह अपने मनचाहे लिंग की विशेषताओं को हासिल करने में हो गई, लेकिन इस सबसे (आवाज में आए बदलाव के चलते) उसे अपने गायकी के पेशे से हाथ धोना पड़ा. इसलिए, इन सब चीजों के लिए आपके पास एक भविष्यवादी (फ्यूचरिस्टिक) दृष्टि होनी चाहिए और कोई निर्णायक बिंदु भी होना चाहिए.

जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी के लिए जरूरी कागजी कार्यवाही

लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी के लिए आवश्यक प्रमाणपत्रों और मंजूरी के बारे में बताते हुए डॉ. मेहता ने कहा,

इस बात का प्रमाण पत्र इस सर्जरी की मंजूरी के लिए जरूरी है जो बताता हो कि हां, वह व्यक्ति जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित है, न कि किसी अन्य बीमारी के साथ ही वह सर्जरी कराने के लिए फिट है.

सर्टिफिकेशन और डॉक्‍यूमेंटेशन में लगने वाले समय के बादे में डॉ मेहता ने कहा,

यह आम तौर पर एक या दो सिटिंग में हो जाता है, बशर्ते हमारे पास उनके मामले को समझने के लिए पर्याप्‍त सामग्री हो. यह काम शारीरिक मूल्यांकन और डॉक्‍टरी जांच से भी किया जा सकता है, जिसके विभिन्न पैमाने होते हैं. हालांकि व्यक्तिगत रूप से, मुझे लगता है, क्‍लीनिकल असेसमेंट बेहतर रहता है. कभी-कभी केवल यह सुनिश्चित करने के लिए शारीरिक जांच कराई जाती है कि कहीं कोई विकार (डिसऑर्डर) छूट तो नहीं गया है.

डॉ. मेहता ने बताया कि एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय को हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के साथ-साथ ऊपर और नीचे (टॉप एंड बॉटम) की सर्जरी के लिए सार्टिफिकेट की जरूरत होती है. उन्‍होंने कहा,

अलग-अलग सर्जरी के लिए अलग-अलग प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है. उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को शीर्ष सर्जरी और एचआरटी कराना है, तो केवल एक मनोचिकित्सक प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है। जो लोग बॉटम सर्जरी भी कराना चाहते हैं, उनके लिए दो मनोचिकित्सक प्रमाणपत्रों की आवश्यकता होती है. कायदे से तो, सर्जरी कराने वाले लोगों को लंबे समय तक मनोचिकित्सक द्वारा क्‍लीनिकल ऑब्‍जर्वेशन में रखा जाना चाहिए. उपचार का मतलब सिर्फ दवा नहीं है, थेरेपी सेशन भी इसमें आता है.

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जेंडर रिअसाइनमेंट ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले जानने योग्य बातें

यह समझाते हुए कि मनोचिकित्सक द्वारा प्रमाण पत्र दिए जाने से पहले किस प्रकार की काउंसलिंग की जाती है, डॉ. मेहता ने कहा,

उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि यह एक अपरिवर्तनीय यानी इर्रिवर्सेबल प्रक्रिया है. हम अपने मरीजों से सर्जरी और हार्मोन उपचार से पहले कुछ समय के लिए उनके वांछित लिंग वाले व्‍यक्ति की तरह जीने के लिए कहते हैं. हम उनसे अपना नाम बदलने के लिए कहते हैं, हम उनसे कहते हैं कि वे कुछ समय के लिए अपने इच्छित लिंग के अनुसार निजी और सार्वजनिक दोनों परिवेशों का पता लगाएं. इस तरह, उन्हें उनको उनके वांछित लिंग की भूमिका में सहज बनाया जा सकता है, जिसे सर्जरी के बाद उन्हें अपनाना होगा. साथ ही, इससे उन्हें उन सभी प्रकार की चुनौतियों और परिस्थितियों के लिए तैयार होने में मदद मिलेगी, जिनका उन्हें सर्जरी होने के बाद सामना करना पड़ सकता है.

लिंग बदलवाने की इच्‍छा वाले LGBTQIA+ व्यक्ति के लिए प्रमुख चुनौतियां

LGBTQIA+ समुदाय के किसी व्यक्ति को अपनी लिंग परिवर्तन यात्रा शुरू करने से पहले क्या उम्मीद करनी चाहिए और उन्‍हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, इसके बारे में बात करते हुए डॉ. मेहता ने कहा,

हमें इस समुदाय के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए. हमें समझना चाहिए वे पीड़ित हैं. उन्हें जीवन में बहुत कष्ट सहना पड़ा है, उन्होंने अपने परिवारों को खो दिया है और उन्हें डराया-धमकाया भी गया है. इन लोगों का यौन शोषण भी खूब होता है. जितनी चुनौतियाँ आम लोगों के सामने आती हैं, वह तो इनके सामने आती हैं, इसके अलावा भी इन्‍हें कई तरह की बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. अवसाद, चिंता, नशीली दवाओं का सेवन इस समुदाय के सामने आने वाली इन चुनौतियों के परिणाम हैं. वे अकसर असुरक्षित और अल्पसंख्यक होते हैं और उनके पास कोई सपोर्ट सिस्‍टम भी नहीं होता. इसीलिए उन्हें काउंसलिंग की जरूरत है और उन्हें मनोचिकित्सक की निगरानी में रहना चाहिए.

अंत में, उम्मीदों के बारे में बात करते हुए डॉ. मेहता ने कहा,

जान लें कि लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी अपरिवर्तनीय है. एक बार हो जाने के बाद आप इसे बदल नहीं सकते. LGBTQIA+ समुदाय को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि सर्जरी होने के बाद उनके मित्र और फैमिली ग्रुप बदल सकते हैं. उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि सर्जरी के बाद वे जैविक माता-पिता नहीं बन सकते. आखिरी बात यह कि यह उपचार और सर्जरी महंगी है, उन्हें इसका खर्च उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए और यह बात समझ लेनी चाहिए कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति बदल सकती है.

प्राइड मंथ में एक मनोचिकित्सक का संदेश

डॉ. मेहता ने कहा कि भारत में ऐसे पेशेवरों की कमी है, जिनके पास LGBTQIA+ समुदाय को संभालने का अनुभव और विशेषज्ञता हो. इस बात पर प्रकाश डालते हुए कि डॉक्टर और प्रोफेशनल्‍स इलाज में कैसे मदद कर सकते हैं, उन्होंने कहा,

कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से LGBTQIA+ नहीं है, कोई भी अपनी खुशी से लिंग नहीं बदलवाता. यह जेनेटिक गड़बड़ी के कारण होता है. इस बात को समझें कि यह एक प्राकृतिक घटना है और इसका इलाज बाकी लोगों के इलाज की तरह ही किया जाना चाहिए. LGBTQIA+ समुदाय को बिना किसी नियम और शर्त के हर जगह स्वीकार किया जाना चाहिए. हेल्‍थ केयर प्रोफेशनल्‍स के लिए मेरा सुझाव यह है कि इनके प्रति सहानुभूति रखें, इनकी बात सुनें, उन्हें समझें और इन्‍हें इनके सही नाम या सर्वनाम से बुलाएं. आखिरी बात यह कि जितना संभव हो सके. विषय को समझें और जजमेंटल होने से बचें.

बातचीत समाप्‍त करते हुए डॉ. मेहता ने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय के बारे में जानकारी को पढ़ाई में शामिल करने से भारतीय समाज इनके प्रति सहिष्‍णु बन सकता है। उन्होंने कहा,

शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है. सभी को शुरू से ही इस विषय के प्रति संवेदनशील रहना सिखाया जाना चाहिए. लिंग विविधता भारत में स्कूली स्‍तर पर पाठ्यक्रम का हिस्सा होनी चाहिए, न कि केवल चिकित्सा पाठ्यक्रम का. अब समय आ गया है कि हम लिंग को केवल पुरुष और महिला के रूप में देखना बंद करें.

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