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कुपोषण

महामारी से सीख: मिलिए मध्य प्रदेश की कृष्णा मवासी से, जिनके किचन गार्डन ने उनके गांव को भुखमरी से बचाया

सामुदायिक कुपोषण प्रबंधन परियोजना के तहत पहली बार सब्जियां उगाने वाली कृष्णा ने अपने ग्रामीणों को भुखमरी से बचाने के लिए अपनी फसल मुफ्त में दे दी.

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महामारी से सीख: मिलिए मध्य प्रदेश की कृष्णा मवासी से, जिनके किचन गार्डन ने उनके गांव को भुखमरी से बचाया
Highlights
  • मवासी जनजाति सबसे कमजोर जातियों में से एक है, इनकी आजीविका छोटे पैमाने की खेती पर निर्भर करती है.
  • COVID-19 के कारण मवासी जनजाति द्वारा बेचे जाने वाले प्रोडक्‍ट्स की मांग में गिरावट आई है
  • कृष्णा ने अपने ग्रामीणों का पेट भरने के लिए अपने किचन गार्डन से 20,000 रुपये की उपज दान की है.

दूसरों की जरूरतों को अपने सामने रखना वास्तव में एक सच्चे योद्धा की निशानी है. ठीक ऐसा ही 46 साल की कृष्णा मवासी ने किया, उन्‍होंने अपने गांव को भुखमरी से बचाने के लिए महीनों तक कड़ी मेहनत करने के बाद अपनी फसल का सब कुछ दे दिया. कृष्णा मध्य प्रदेश में सतना जिले के मझगवां प्रखंड के केल्होरा गांव में रहती हैं, जहां आज भी बच्चे कुपोषण के कारण अपनी जान गंवाते हैं.

वह एक अत्यंत पिछड़ी जनजाति – मवासी से ताल्लुक रखती है और जनजाति की पूरी आजीविका वन उत्पादों और छोटे पैमाने की खेती पर निर्भर करती हैं.

हालांकि, सही बारिश न होने और सिंचाई सुविधाओं की कमी ने इस जनजाति को दूसरे राज्यों में काम करने के लिए पलायन करने पर मजबूर किया है.

साल की इस अवधि के दौरान, सभी मवासी पुरुष, जो काम के लिए पलायन करते हैं, वे महुआ, तेंदू, चिरौंजी जैसे वन उत्पादों के संग्रह के लिए अपने-अपने गांव लौट जाते हैं. यह उनके लिए कमाई का बड़ा जरिया है. दुर्भाग्य से, COVID-19 महामारी के चलते बैक-टू-बैक लॉकडाउन के कारण, कोई खरीदार नहीं है. COVID-19 महामारी ने न केवल स्वास्थ्य संकट बल्कि मवासी परिवारों के लिए एक बड़ा वित्तीय संकट भी पैदा कर दिया है.

सामुदायिक कुपोषण प्रबंधन परियोजना के तहत पहली बार सब्जियां उगाने वाली कृष्णा अपने गांव की स्थिति जानने के कारण वह जो भी उगा रही हैं, उसे मुफ्त में दे रही है.

सामुदायिक कुपोषण परियोजना मझगवां ब्लॉक के गांवों में चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के एक सहयोगी संगठन विकास संवाद द्वारा चलाई जा रही है. इस कार्यक्रम के तहत कृष्णा जैसे लोगों को उनके पिछले आंगन में खेती के लिए बीज और सहायता प्रदान की जाती है.

CRY के एक प्रवक्ता ने एनडीटीवी को बताया, ‘केवल सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के बजाय किचन गार्डन विकसित करना कुपोषण को रोकने का एक तरीका है.’

कृष्णा ने करीब दो क्विंटल प्याज, टमाटर, धनिया, बैगन, पालक और भिंडी की खेती की. इस उपज का बाजार मूल्य लगभग 20,000 रुपये है, लेकिन कृष्णा ने उन्हें अपने गांव की सभी महिलाओं को दे दिया ताकि वे अपने बच्चों को खिला सकें.

मझगवां ब्‍लॉक बच्चों में कुपोषण से होने वाली मौतों के लिए जाना जाता है और मावासी जनजाति इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है, कृष्णा के इस कदम की कई लोगों ने सराहना की है.

कृष्णा ने एनडीटीवी को बताया, ‘मैं अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन परोसने के मकसद से पिछले साल किचन गार्डन प्रोजेक्ट से जुड़ी थी. पिछले साल कम मात्रा में सब्जियों की खेती करने के बाद, उत्पादन के एक हिस्से को बेचने की उम्मीद के साथ, मैंने इस साल उन्हें थोड़े बड़े पैमाने पर उगाने का फैसला किया. लेकिन महामारी ने मेरी सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया और पूरे गांव को भोजन के लिए परेशान होना पड़ा, इसने मुझे अन्य ग्रामीणों, विशेषकर बच्चों और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं की मदद करने के लिए मजबूर किया. इसलिए मैंने अपने आंगन में उगाई गई सब्जियों को मुफ्त में बांटने का फैसला किया,’

CRY की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा ने NDTV को बताया कि COVID-19 महामारी के बीच, CRY का किचन गार्डन और पोल्ट्री फार्मिंग कार्यक्रम कभी भी अधिक मूल्यवान नहीं रहा है.

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उन्‍होंने कहा,

हमारे समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन कार्यक्रम ने ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य असुरक्षा और पोषण संबंधी मुद्दों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हमारा किचन गार्डन और पोल्ट्री फार्मिंग कार्यक्रम कभी भी अधिक मूल्यवान नहीं रहा. विशेष रूप से गरीब परिवारों के लिए, जो मुश्किल से सब्जियां, फल, चिकन और अंडे खरीद सकते थे, ये कार्यक्रम परिवार के आहार में पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गए.

मोइत्रा का कहना है कि चूंकि कई राज्यों में स्कूल फिर से खुल रहे हैं, इसलिए मिडडे मील बांटना फिर से शुरू हो जाएगा, लेकिन हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई है.

हमें, एक राष्ट्र के रूप में, एक ऐसे तंत्र के साथ आने की आवश्यकता है जहां बच्चों को महामारी के बावजूद गर्म, ताजा पौष्टिक भोजन मिलता रहे, क्योंकि सूखा राशन और नकद राशि का वितरण बच्चे की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता है. बच्चों के लिए सामुदायिक रसोई विकसित करने, फलों, अंडों और अन्य पोषक खाद्य पदार्थों के साथ सूखे राशन के वितरण जैसे ठोस समाधान शुरू किए जा सकते हैं. इसके अलावा, विशेष रूप से गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का समय पर वितरण सुनिश्चित करना और नुकसान से बचने के लिए समय की जरूरत है.

आखिर में, मोइत्रा ने यह कहते हुए अपनी बात खत्‍म की कि कोविड महामारी ने हमें सिखाया है कि पब्लिक हेल्‍थ के लिए पर्याप्त बजट आवंटित करना कितना महत्वपूर्ण है, और यह चाइल्‍ड हेल्‍थकेयर के लिए भी सही है.

उन्‍होंने कहा,

बजटीय प्रावधानों के संदर्भ में बाल स्वास्थ्य देखभाल को अब पहले से कहीं अधिक अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

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